Tagged: Hindi Poetry

सोच 0

सोच

सोच-सोचकर तुमको मेरी सोच ख़त्म हो चली है । सोचा था तुम्हें सोचकर , अपने ग़मों को नहीं सोचूंगा । फ़िर सोचा कि तुम्हारी सोच ही तो मेरे ग़म हैं । क्या तुम्हारी सोच...

बीता बचपन 0

बीता बचपन

नज़रें फिर से देखना चाहती हैं, लब फिर से बोलना चाहते हैं। हृदय फिरसे सुनना चाहते हैं। -वो लम्हें, वो पल, वो शब्द जो गुजर गए हैं। -गली में कूदता बचपन और चैराहे पर...

आज वो फिर अकेली पड़ गयी 0

आज वो फिर अकेली पड़ गयी

-आज वो फिर अकेली पड़ गयी. सहसा एक जिस्म ऐसा मिला हजार नजरो से बचता अपनो से डरा स्वरों से निशब्द, लापता संवेदना -आज वो फिर अकेली पड़ गयी. जिसकी किलकारियां थी सबको हँसाती...

निर्भया 0

निर्भया

कुछ शहर की सड़को पर मोमबत्तिया जरूर जलाएंगे । पर माफ़ करना बहन हम तेरी लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे ।। कुछ झूठी बयानबाजी होगी, कोई नेता चिल्लायेगा, पक्ष संवेदना प्रकट करेगा, विपक्ष सत्ता हिलायेगा,...

क्यों नहीं सुनाई पड़ती इनको किसी की आह! 0

क्यों नहीं सुनाई पड़ती इनको किसी की आह!

क्यों नहीं सुनाई पड़ती इनको किसी की आह! क्यों कर देते हैं इतना बड़ा गुनाह! क्यों कुछ मिनटों में बरबाद कर देते हैं ज़िन्दगी क्यों है इतनी दरिंदगी! क्यों नहीं सोंचते एक पल क्या...

मैं चित्रकूट का घाट तेरा 0

मैं चित्रकूट का घाट तेरा

  तुमसे ही सम्मान मिला है, तुमसे ही पहचान मेरी तुम गंगा का बहता पानी, मैं चित्रकूट का घाट तेरा |   तुम बन जाओ मेरी प्रेयषी गंगा, मैं बन जाऊँ अनुरागीं तेरा तुम गंगा का बहता पानी, मैं चित्रकूट का घाट तेरा |   कंदमूल, वानर है सब मेरे साथी, तुम बन जाओ गंगा सखी मेरी तुम गंगा का बहता पानी, मैं चित्रकूट का घाट तेरा |   मैं अधूरी मेरे राम के बिना तुम बन जाओ सीता मेरी, मैं बन जाऊँ राम तेरा...

मन की पीर 2

मन की पीर

क्या लिखूँ..!! नारी का उपहास लिखूँ या नारी मन की पीर लिखूँ..!! जलता हुआ इतिहास लिखूँ या पैरों की जंजीर लिखूँ..!! मरता आँख का पानी लिखूँ या खिंचता अंग का चीर लिखूँ..!! गंगा सी...

इश्क़ इत्र है 0

इश्क़ इत्र है

ख़्वाहिशों का अजब सा शोर है एक रूठता है,इक मानता है इश्क में हर शख़्श, अपना ज़ोर आजमाता हैं।। दिल चीज ही ऐसी है इक का टुटता है, तो एक का जुड़ता हैं कोई...

आईने में नज़र मिला के!! 0

आईने में नज़र मिला के!!

यहाँ उठते हैं ऊपर,लोग जमीर गिरा के गिरते हैं अक्सर,आईने में नज़र मिला के बनकर कठपुतली यहाँ लोगो के हाथों करते चापलूसी,अपनी आत्मा गँवा के दोष नही अब हवाओं का फ़िज़ा में कोई खूब...

कितने हैं लोग… लेकिन खुश नहीं 0

कितने हैं लोग… लेकिन खुश नहीं

कितने हैं लोग जिन्हें खुद की तलाश है और कितने हैं जो ख़ुदा को पाकर भी खुश नहीं…   कितने हैं लोग जिनकी ख्वाहिशें बहुत हैं और कितने हैं जो बहुत पाकर भी खुश...

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