Tagged: Dushyant Kumar

कुंठा – दुष्यंत कुमार 0

कुंठा – दुष्यंत कुमार

मेरी कुंठा रेशम के कीड़ों-सी ताने-बाने बुनती, तड़प तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ’ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुंठा –- कुँवारी कुंती! बाहर आने दूँ...

चीथड़े में हिन्दुस्तान – दुष्यंत कुमार 0

चीथड़े में हिन्दुस्तान – दुष्यंत कुमार

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है, आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है। ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए, यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है। एक...

तुमको निहरता हूँ सुबह से ऋतम्बरा – दुष्यंत कुमार 0

तुमको निहरता हूँ सुबह से ऋतम्बरा – दुष्यंत कुमार

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा—डरा पौधे झुलस गए हैं...

दो पोज़ – दुष्यंत कुमार 0

दो पोज़ – दुष्यंत कुमार

सद्यस्नात तुम जब आती हो मुख कुन्तलों से ढँका रहता है बहुत बुरे लगते हैं वे क्षण जब राहू से चाँद ग्रसा रहता है । पर जब तुम केश झटक देती हो अनायास तारों-सी...

अपनी प्रेमिका से – दुष्यंत कुमार 0

अपनी प्रेमिका से – दुष्यंत कुमार

मुझे स्वीकार हैं वे हवाएँ भी जो तुम्हें शीत देतीं और मुझे जलाती हैं किन्तु इन हवाओं को यह पता नहीं है मुझमें ज्वालामुखी है तुममें शीत का हिमालय है फूटा हूँ अनेक बार...

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये – दुष्यंत कुमार 0

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये – दुष्यंत कुमार

अब अंतर में अवसाद नहीं चापल्य नहीं उन्माद नहीं सूना-सूना सा जीवन है कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं तव स्वागत हित हिलता रहता अंतरवीणा का तार प्रिये .. इच्छाएँ मुझको लूट चुकी आशाएं मुझसे...

चीथड़े में हिन्दुस्तान – दुष्यंत कुमार 0

चीथड़े में हिन्दुस्तान – दुष्यंत कुमार

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है, आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है। ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए, यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है। एक...

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख :- दुष्यंत कुमार 0

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख :- दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख। एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न...

मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ :- दुष्यंत कुमार 0

मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ :- दुष्यंत कुमार

मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ वो गज़ल आपको सुनाता हूँ। एक जंगल है तेरी आँखों में मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ तू किसी रेल सी गुजरती है मैं किसी पुल -सा थरथराता हूँ...

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