Tagged: Azin irshad

अलग मज़ा है 0

अलग मज़ा है

महफ़िल के सूने कोने का अलग मज़ा है हँसते जख़्मो को रोने का अलग मज़ा है नज़्मे भी अच्छी लगती पर मेरी मानो ग़ज़लों में ग़म पीरोने का अलग मज़ा है नींदें जाने कैसे...

मेरे अज़ीज़ मुझे सीने से लगाता क्यूँ नहीं  0

मेरे अज़ीज़ मुझे सीने से लगाता क्यूँ नहीं 

मेरे अज़ीज़ मुझे सीने से लगाता क्यूँ नहीं  हूँ बुरा तो कोई मुझे ये बतलाता क्यूँ नहीं खुशामदें बंद करदो तुम वक़्त की करना  वक़्त सही हैं तो वक़्त पर आता क्यूँ नहीं तूने...

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