Shivmangal Singh Suman

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

Maithili Sharan Gupt

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (1 915-2002) एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और शिक्षाविद् थे। उनकी मृत्यु के बाद, भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री ने कहा, “डॉ शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ केवल हिंदी कविता के क्षेत्र में एक शक्तिशाली हस्ताक्षर ही नहीं थे, बल्कि वह अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे। न केवल अपनी भावनाओं का दर्द व्यक्त किया, बल्कि युग के मुद्दों पर भी निर्भीक रचनात्मक टिप्पणी भी थी।

जीवन परिचय

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म 5 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के उनानो जिले के झगेरपुर में हुआ था। वह एक अग्रणी हिंदी लेखक और कवि थे। उन्होंने एक एमए और पीएच.डी. अर्जित किया। बानारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में विश्वविद्यालय ने उन्हें 1950 में डी। लिट के साथ भी सम्मानित किया।।

सुमन ने 1968-78 के दौरान विक्रम विश्वविद्यालय (उज्जैन) के कुलपति के रूप में काम किया; उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ के उपराष्ट्रपति; 1956-61 के दौरान प्रेस और सांस्कृतिक अटैच, भारतीय दूतावास, काठमांडू (नेपाल); और 1977-78 के दौरान राष्ट्रपति, भारतीय विश्वविद्यालयों की संघ (नई दिल्ली) वह कालिदास अकादमी, उज्जैन के कार्यकारी अध्यक्ष थे, 27 नवंबर 2002 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कवितायें 

चल रही उसकी कुदाली / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हाथ हैं दोनों सधे-से गीत प्राणों के रूँधे-से और उसकी मूठ में, विश्वास जीवन के बँधे-से धकधकाती धरणि थर-थर उगलता अंगार अम्बर भुन रहे तलुवे, तपस्वी-सा खड़ा वह आज तनकर शून्य-सा मन, चूर है...

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रणभेरी – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

माँ कब से खड़ी पुकार रही पुत्रो निज कर में शस्त्र गहो सेनापति की आवाज़ हुई तैयार रहो , तैयार रहो आओ तुम भी दो आज विदा अब क्या अड़चन क्या देरी लो आज...

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वरदान माँगूँगा नहीं – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

यह हार एक विराम है जीवन महासंग्राम है तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं। वरदान माँगूँगा नहीं।। स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए अपने खंडहरों के लिए यह जान लो मैं विश्‍व...

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मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं हूँ। चल रहा हूँ, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती, जल रहा हूँ क्योंकि जलने से तमिस्त्रा चूर होती, गल रहा हूँ क्योंकि हल्का...

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तूफानों की ओर घुमा दो नाविक – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज हृदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो...

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मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझानेवाला – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

घर-आंगन में आग लग रही। सुलग रहे वन -उपवन, दर दीवारें चटख रही हैं जलते छप्पर- छाजन। तन जलता है , मन जलता है जलता जन-धन-जीवन, एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बंधन।...

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अंगारे और धुआँ – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

इतने पलाश क्यों फूट पड़े है एक साथ इनको समेटने को इतने आँचल भी तो चाहिए, ऐसी कतार लौ की दिन-रात जलेगी जो किस-किस की पुतली से क्या-क्या कहिए। क्या आग लग गई है...

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हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के...

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मैं अकेला और पानी बरसता है – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

मैं अकेला और पानी बरसता है प्रीती पनिहारिन गई लूटी कहीं है, गगन की गगरी भरी फूटी कहीं है, एक हफ्ते से झड़ी टूटी नहीं है, संगिनी फिर यक्ष की छूटी कहीं है, फिर...

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मिट्टी की महिमा – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी-पिटी, हर बार बिखेरी गई, किंतु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी! आशा में निश्छल पल जाए, छलना में पड़ कर छल जाए सूरज दमके तो...

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पर आंखें नहीं भरीं – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

कितनी बार तुम्हें देखा पर आंखें नहीं भरीं सीमित उर में चिर असीम सौन्दर्य समा न सका बीन मुग्ध बेसुथ कुरंग मन रोके नहीं रूका यों तो कई बार पी पी कर जी भर...

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