Naresh Mehta

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

Naresh Mehta (1922–2000) was a Hindi writer.


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Naresh Mehta was a Hindi writer. There are over 50 published works in his name, ranging from poetry to plays. He received several literary awards, most notably the Sahitya Akademi Award in Hindi in 1988 for his poetry collection Aranya and the Jnanpith Award in 1992.

Among the numerous schools of poetry which sprang up in the 1950s was Nakenwad, a school deriving its nomenclature from the first letters of the names of its three pioneers – Nalin Vilochan Sharma, Kesari Kumar, and Naresh Mehta.

Naresh Mehta’s poetry 

यह सोनजुही-सी चाँदनी – नरेश मेहता

यह सोनजुही-सी चाँदनी नव नीलम पंख कुहर खोंसे मोरपंखिया चाँदनी। नीले अकास में अमलतास झर-झर गोरी छवि की कपास किसलयित गेरुआ वन पलास किसमिसी मेघ चीखा विलास मन बरफ़ शिखर पर नयन प्रिया किन्नर...

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पीले फूल कनेर के – नरेश मेहता

पीले फूल कनेर के पट अंगोरते सिन्दूरी बड़री अँखियन के फूले फूल दुपेर के। दौड़ी हिरना बन-बन अंगना वोंत वनों की चोर भुर लिया समय संकेत सुनाए, नाम बजाए, साँझ सकारे, कोयल तोतों के...

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केवल हिम – नरेश मेहता

हिम, केवल हिम- अपने शिवःरूप में हिम ही हिम अब! रग-गंध सब पिरत्याग कर भोजपत्रवत हिमाच्छादित वनस्पित से हीन धरित्री- स्वयं तपस्या। पता नहीं किस इतिहास-प्रतीक्षा में यहाँ शताब्िदयाँ भी लेटी हैं हिम थुल़्मों...

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माँ – नरेश मेहता

मैं नहीं जानता क्योंकि नहीं देखा है कभी- पर, जो भी जहाँ भी लीपता होता है गोबर के घर-आँगन, जो भी जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है आटे-कुंकुम से अल्पना, जो भी जहाँ...

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वृक्षत्व – नरेश मेहता

माधवी के नीचे बैठा था कि हठात् विशाखा हवा आयी और फूलों का एक गुच्छ मुझ पर झर उठा; माधवी का यह वृक्षत्व मुझे आकण्ठ सुगंधित कर गया । उस दिन एक भिखारी ने...

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पुरुष – नरेश मेहता

हमें जन्म देकर ओ पिता सूर्य ! ओ माता सविता ! क्या इसलिए तुम मार्तण्ड हो कि अब तुम प्रकाश के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जन्म दे सकते ? मैं जानता हूँ तुम...

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इतिहास और प्रतिइतिहास – नरेश मेहता

राम : क्या यही है मनुष्य का प्रारब्ध ? कि कर्म निर्मम कर्म केवल असंग कर्म करता ही चला जाए ? भले ही वह कर्म धारदार अस्त्र की भांति न केवल देह बल्कि उसके...

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सिंचित है केसर के जल से – नरेश मेहता

किरणमयी ! तुम स्वर्ण-वेश में स्वर्ण-देश में !! सिंचित है केसर के जल से इन्द्रलोक की सीमा आने दो सैन्धव घोड़ों का रथ कुछ हल्के-धीमा, पूषा के नभ के मन्दिर में वरुणदेव को नींद आ रही...

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थके गगन में उषा-गान – नरेश मेहता

थके गगन में उषा-गान !! तम की अँधियारी अलकों में कुंकम की पतली-सी रेख दिवस-देवता का लहरों के सिंहासन पर हो अभिषेक सब दिशि के तोरण-बन्दनवारों पर किरणों की मुसकान !! प्राची के दिकपाल इन्द्र ने...

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हिमालय के तब आँगन में – नरेश मेहता

हिमालय के तब आँगन में— झील में लगा बरसने स्वर्ण पिघलते हिमवानों के बीच खिलखिला उठा दूब का वर्ण शुक्र-छाया में सूना कूल देख उतरे थे प्यासे मेघ तभी सुन किरणाश्वों की टाप भर...

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अभी महल का चाँद – नरेश मेहता

नीलम वंशी में से कुंकम के स्वर गूँज रहे !! अभी महल का चाँद किसी आलिंगन में ही डूबा होगा कहीं नींद का फूल मृदुल बाँहों में मुसकाता ही होगा नींद भरे पथ में वैतालिक...

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किरन-धेनुएँ – नरेश मेहता

उदयाचल से किरन-धेनुएँ हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला। पूँछ उठाए चली आ रही क्षितिज जंगलों से टोली दिखा रहे पथ इस भूमा का सारस, सुना-सुना बोली गिरता जाता फेन मुखों से नभ...

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