Category: Saurabh Chauhan

तिश्नगी 0

तिश्नगी

दो दिन की ज़िन्दगी, करीब आने में गुज़ार दी अब जीना है मुझे, एक और ज़िन्दगी दे-दे   वस्ल की रात को गुज़र जाने की उजलत थी तेरी बाहों में हूँ अभी, थोड़ा  और...

ज़ुल्फ़ें 0

ज़ुल्फ़ें

ज़ुल्फ़ें ही तो बिखरायी थी  उफ़्फ़! रात सी घिर आयी थी    निगाहें उसे तकती रही देर तक  और मदहोशी सी छायी थी    तेरी तस्वीर आँखों में हर पल  रग-२ में बस तू समाई...

उसकी पलकों में सिमट गयी है ज़िन्दगी 1

उसकी पलकों में सिमट गयी है ज़िन्दगी

उसकी पलकों में सिमट गयी है ज़िन्दगी, खुल जाए, तो कई राज़ बिखर जायेंगे… उसकी ज़ुल्फ़ों में जो मकान है, वो मेरा है.. झटक दें, तो हम बेघर हो जायेंगे.. उसके चेहरे के नूर...

एहसास 0

एहसास

बिखरी सी क्यों है ज़ुल्फ़ें, आँखों में ख्याल किसका है लबों पर हंसी है क़यामत ये बता दे सवाल किसका है आँखों में डूब कर पता चला, दिल में वो मकान किसका है चुप...

ज़िन्दगी बेनूर सी क्यों ? 0

ज़िन्दगी बेनूर सी क्यों ?

ज़िन्दगी बेनूर सी क्यों जैसे आशना दूर जाने लगा रंजिश नहीं न ही कोई रंज है दिल में न जाने कौन मुझे आज़माने लगा सुन रहा हूँ मैं मगर क्या शोर बहुत है रोका...

रात होने  वाली  है    0

रात होने  वाली  है   

सूरज  ने  क्यों  बिस्तर  बाँध  लिया लगता  है  अब  रात  होने  वाली  है .. सुना  है  बहुत  हसीं  होती  उनके  दीदार  के  बाद , चलो  खुश  हुआ  जाए  रात  होने  वाली  है .. उसकी...

रेत का समंदर 0

रेत का समंदर

रेत का समंदर में वो कुछ ढूंढते रहे हवा के थपेड़ो में कोई लफ्ज़ था जो न मिला, बाजार में निकल कर भी, निगाहें तलाशती रही, हम भी समझ न पाए, वो कौन था...

वो अंगुलियां बहुत याद आयी 0

वो अंगुलियां बहुत याद आयी

कभी चलना सिखाया, संभल न सका में जब गिरकर संभालना सिखाया सहारे के लिए वो अंगुलिया किसी सीढ़ी से काम नहीं आदत नही ज़रूरत थी वो अंगुलियां लिखना सिखाया, खेलना सिखाया धीरे धीरे मुट्ठी...

रेत का समंदर 0

रेत का समंदर

रेत का समंदर में वो कुछ ढूंढते रहे हवा के थपेड़ो में कोई लफ्ज़ था जो न मिला, बाजार में निकल कर भी, निगाहें तलाशती रही, हम भी समझ न पाए, वो कौन था...

किस-किस  को खुदा कहे 0

किस-किस को खुदा कहे

दरिया है किसे पता कितनो को बहाया होगा हमें तो बस उसका बल खाना अच्छा लगता है , वो आये तो हम साथ शहर दिखाने चल दिए , हमें तो बस उनके पास जाना...

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