Category: Manav Kaul

दहलीज़ पार… 0

दहलीज़ पार…

तुम्हारी दहलीज़ पर खड़े रहकर, कितनी ही बार मैंने कसम खाई है कि- ‘नहीं..मैं भीतर नहीं जाऊगां।’ ‘मैं दरवाज़ा भी नहीं खटखटाऊगां…ना।’ और कुछ ही देर में मैं तुम्हारे साथ, तुम्हारे बगल में पाया...

ख़त… 0

ख़त…

ख़त, तुल्नात्मक अध्ययन में… हमेशा धीमी गति से चलने वाला… घोड़ा होगा। पर भाव फेंकना, गर प्रमुख है, तो मैं इस घुड़सवारी के खेल में, खच्चर होना चाहूगाँ। और अगर इस खेल में गति...

दर्शक… 0

दर्शक…

वह कहती थी इसे बचाकर रखते हैं…. यह हमारी धूप है… जब हम ठिठुर रहे होगें तो यह काम आएगी। फिर यहाँ वहाँ कुछ काँटे भी बीना करती थी…. कहती थी… जब दूसरे गड़ेगें...

आलू… 0

आलू…

अपनी छोटी सी मर्यादा के भीतर काम करते हुए… भूख चार फल्लांग बाहर… पड़ी दीखती है। अपनी मर्यादा का बिस्तरा… भूख के पास जाते ही कटोरा हो जाता है। सपने में खाते रहने से...

बहुत पहले… 2

बहुत पहले…

बहुत पहले… अब तो मुझे याद भी नहीं कब, मैंने अपने हाथ पर लिख दिया था- ‘प्रेम’। क्यों ? क्यों का पता नहीं, पर शायद ये- मेरे भीतर पड़े सूखे कुंए के लिए, बाल्टी...

श्रम 0

श्रम

क्या हमारा श्रम तोला जा सकता है? क्या कहा जाएगा कि ’इसका तो इतना ही होगा भाई’ या कहा जाएगा कि ’यह काफी नहीं है।’ मैंने श्रम दान किया है… इस तरह की कोई...

सूटकेस 1

सूटकेस

मेरी पल्कों के बाल कई बार मेरी हथेली तक आए हैं, पर मैंने कभी उन्हें आँखें बंद करके उड़ाया नहीं। मैंने कई बार तारों को भी टूटते हुए देखा है, पर मेरी आँखें तब...

रंग… 1

रंग…

अगर मैं तुम्हें पेंट कर सकता तो…? रंगों के इस जमघट में… कौन सा रंग हो तुम??? नीला… आसमान सा कुछ..? गुलाबी तो कतई नहीं.. या हरा.. गहरा घने पेड़ जैसा कुछ। पीला तो...

पर जंग कभी हुई नहीं… 0

पर जंग कभी हुई नहीं…

पर जंग कभी हुई नहीं… चाकू, भाले, तलवारों में धार तेज़ थी। रणनीतियों की किताबें हम, घोंट-घोंट कर पी चुके थे, बदले की भावना से सब ओत-प्रोत थे। पर जंग कभी हुई नहीं। जंग...

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बुढ़ापा…

हर आदमी कुछ समय के बाद नीचे रख दिया जाता है। नीचे रख दिया जाना… उसे पता लग जाता है। ‘अब आराम करो’- की बजाए… ‘अब इंतज़ार करो’- उसे सुनाई देता है। अलग कर...

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