Category: Maithili Sharan Gupt

आर्य – मैथिलीशरण गुप्त 0

आर्य – मैथिलीशरण गुप्त

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां फैला मनोहर गिरि हिमालय, और...

दोनों ओर प्रेम पलता है – मैथिलीशरण गुप्त 0

दोनों ओर प्रेम पलता है – मैथिलीशरण गुप्त

दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है! सीस हिलाकर दीपक कहता– ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’ पर पतंग पड़ कर ही रहता कितनी विह्वलता है!...

मनुष्यता – मैथिलीशरण गुप्त 0

मनुष्यता – मैथिलीशरण गुप्त

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸ मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी। हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸ नहीं वहीं कि जो जिया न...

अर्जुन की प्रतिज्ञा – मैथिलीशरण गुप्त 0

अर्जुन की प्रतिज्ञा – मैथिलीशरण गुप्त

उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा । मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित...

किसान (कविता) – मैथिलीशरण गुप्त 0

किसान (कविता) – मैथिलीशरण गुप्त

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं...

कुशलगीत – मैथिलीशरण गुप्त 0

कुशलगीत – मैथिलीशरण गुप्त

हाँ, निशान्त आया, तूने जब टेर प्रिये, कान्त, कान्त, उठो, गाया— चौँक शकुन-कुम्भ लिये हाँ, निशान्त गाया । आहा! यह अभिव्यक्ति, द्रवित सार-धार-शक्ति । तृण तृण की मसृण भक्ति भाव खींच लाया । तूने...

सखि वे मुझसे कह कर जाते – मैथिलीशरण गुप्त 0

सखि वे मुझसे कह कर जाते – मैथिलीशरण गुप्त

सखि, वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते? मुझको बहुत उन्होंने माना फिर भी क्या पूरा पहचाना? मैंने मुख्य उसी को जाना जो वे मन में लाते। सखि,...

चारु चंद्र की चंचल किरणें – मैथिलीशरण गुप्त 0

चारु चंद्र की चंचल किरणें – मैथिलीशरण गुप्त

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानों झीम[1] रहे हैं तरु...

नहुष का पतन – मैथिलीशरण गुप्त 0

नहुष का पतन – मैथिलीशरण गुप्त

मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की अरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग...

Please wait...

Never Miss Any Poetry, Join Our Family

Want to be notified when any New Poetry Published? Enter your email address and name below to be the first to know.