Category: Kavishala

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वो तेरे प्यार का गम ”तुम्हें क्या मिला वह तो मैं नहीं जानता लेकिन एक बात जरूर जानता हूँ कि तुमने उस शख्स को खोया है जो कभी अपने आपसे भी ज्यादा तुम्हें प्यार...

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वो तेरे प्यार का गम ”तुम्हें क्या मिला वह तो मैं नहीं जानता लेकिन एक बात जरूर जानता हूँ कि तुमने उस शख्स को खोया है जो कभी अपने आपसे भी ज्यादा तुम्हें प्यार...

आवाज़ें 2

आवाज़ें

क्या है ये आवाजे वो जो सुनाई देती हैं, या वो भी जो सुनाई नही देती, कुछ धीमी,कुछ तेज़, गाड़ियों की, लोगों की औऱ भी न जाने कौन कौन सी आवाजें, कितनी आवाजे जो...

रे मुर्ख उठ कहा सो रहा तू  तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है  कहा रो रहा है तू  ,ये नवल धरा ये नवल ज्योति तुझसे हिसाब मांग रहा है  कहा छुपा था अभी तक ये बात पूछ रहा है ,तेरी हस्ती तुझमे डूबी है ये बात साल रहा है ,लाख कुटिल हो ह्रदय फिर भी जान दे रहा है, अपनी उम्मीदों को तुझमे देख हर साल जी रहा है रे मुर्ख उठ खा सो रहा है तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है ,कहा रो।रहा  है तू  कर दे अपना सर्वश्र न्यौछावर ये बात बोल रहा है ,हो जाए यौवन भस्म ये हाल बोल रहा है तेरी एक तर्पण से सबका नाम होगा तेरी एक समर्पण से सब काम होगा ऐसी हसरत पाल सब संसार बोल रहा है  रे मुर्ख उठ कहा सो रहा है ,तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है कहा रो रहा है तू  Composed By -Pawan Tripathi 0

रे मुर्ख उठ कहा सो रहा तू तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है कहा रो रहा है तू ,ये नवल धरा ये नवल ज्योति तुझसे हिसाब मांग रहा है कहा छुपा था अभी तक ये बात पूछ रहा है ,तेरी हस्ती तुझमे डूबी है ये बात साल रहा है ,लाख कुटिल हो ह्रदय फिर भी जान दे रहा है, अपनी उम्मीदों को तुझमे देख हर साल जी रहा है रे मुर्ख उठ खा सो रहा है तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है ,कहा रो।रहा है तू कर दे अपना सर्वश्र न्यौछावर ये बात बोल रहा है ,हो जाए यौवन भस्म ये हाल बोल रहा है तेरी एक तर्पण से सबका नाम होगा तेरी एक समर्पण से सब काम होगा ऐसी हसरत पाल सब संसार बोल रहा है रे मुर्ख उठ कहा सो रहा है ,तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है कहा रो रहा है तू Composed By -Pawan Tripathi

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रे मुर्ख उठ कहा सो रहा तू तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है कहा रो रहा है तू ,ये नवल धरा ये नवल ज्योति तुझसे हिसाब मांग रहा है कहा छुपा था अभी तक...

नांदिया स्रोत पर ही सुख जाये तो प्रवाह कैसे होगा  हम चलने से पहले डर जाये तो आगाज़ कैसे होगा  आँखों से जगत को देखे तो संवेदना उमड़ने लगता है  कलम का सिपाही बनने से जबान से झरना फूटने लगता है  दहलाने की की साज़िश का रस चखकर मन असहज हो जाता है 1 अपने अनुभव की अभिव्यक्ति क्या करूँ कभी कभी ही छलक पाता हूं  औरो की बेबसी को सोचकर भी कभी कभी ही जिक्र कर पाता हूं  अपनी उतेजना से अक्सर जज्बातों मे ही सिमट जाता हूं 2 पड़ी की पड़ी रह गयी है मुसीबत का कुनबा जिसे आज तक न स्पर्श कर पाया हूं  आते जाते देखा बहुतो को पर बक्तव्य से निकलकर परिणाम तक ना किसी को पहुचता देख पाया हूं  नांदिया स्रोत पर ही सुख जाए तो प्रवाह कैसे होगा ,हम चलने से पहले डर जाये तो आगाज़ कैसे होगा  Composed by -Pawan Tripathi 0

नांदिया स्रोत पर ही सुख जाये तो प्रवाह कैसे होगा हम चलने से पहले डर जाये तो आगाज़ कैसे होगा आँखों से जगत को देखे तो संवेदना उमड़ने लगता है कलम का सिपाही बनने से जबान से झरना फूटने लगता है दहलाने की की साज़िश का रस चखकर मन असहज हो जाता है 1 अपने अनुभव की अभिव्यक्ति क्या करूँ कभी कभी ही छलक पाता हूं औरो की बेबसी को सोचकर भी कभी कभी ही जिक्र कर पाता हूं अपनी उतेजना से अक्सर जज्बातों मे ही सिमट जाता हूं 2 पड़ी की पड़ी रह गयी है मुसीबत का कुनबा जिसे आज तक न स्पर्श कर पाया हूं आते जाते देखा बहुतो को पर बक्तव्य से निकलकर परिणाम तक ना किसी को पहुचता देख पाया हूं नांदिया स्रोत पर ही सुख जाए तो प्रवाह कैसे होगा ,हम चलने से पहले डर जाये तो आगाज़ कैसे होगा Composed by -Pawan Tripathi

बस कल से ……♥️ 0

बस कल से ……♥️

कल से सिरहाने लिए तुम्हारी तस्वीर बैठा हूँ बस कल से ही तुम्हारी याद आई है बस कल से मौसम ने भी रंग बदला है बस कल से दीवारों ने भी सीलन खाई है...

मैं (इंसानियत की कहानी,उसी की ज़ुबाँनी 0

मैं (इंसानियत की कहानी,उसी की ज़ुबाँनी

इष्टों की कृपा भी मैं, ख़ुदा की पाक़ फ़ज़ल भी हूँ। मुंशी का गोदान भी मैं, ग़ालिब की शोख़ ग़ज़ल भी हूँ।1। दरगाहों की चादर भी मैं, मंदिर में चढ़ी चुनरी भी हूँ। सेंवई...

छोटी सी कहानी में…खो गये 2

छोटी सी कहानी में…खो गये

छोटी सी कहानी में… (बारिशों के पानी में  पानी की बूंदों में बूंदों के आंसू में आंसू की आंखों में  आंखों के सपनों में सपनों की नींदों में नींदों की करवट में  करवट की...

Meri Kalam by Sanjeev Dixit “Bekal” 1

Meri Kalam by Sanjeev Dixit “Bekal”

मेरे क़लम की आग इस क़दर मशाल बन गई, कई सूखे मकान राख हुए, कई रातों को बेइन्ताह रोशनी मिली , और ये क़लम-ए-दारी का दौर कुछ ऐसा चला, ख़ाक से नये बीज़ उपजे,...