Category: Kavishala

अफ़साने – गुलज़ार 0

अफ़साने – गुलज़ार

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में एक पुराना खत खोला अनजाने में जाना किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं चाँद...

मौत तू एक कविता है – गुलज़ार 0

मौत तू एक कविता है – गुलज़ार

मौत तू एक कविता है मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे दिन अभी पानी...

इक जरा छींक ही दो तुम – गुलज़ार 0

इक जरा छींक ही दो तुम – गुलज़ार

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के औरतें गाती हैं जब...

स्पर्श – गुलज़ार 0

स्पर्श – गुलज़ार

कुरान हाथों में लेके नाबीना एक नमाज़ी लबों पे रखता था दोनों आँखों से चूमता था झुकाके पेशानी यूँ अक़ीदत से छू रहा था जो आयतें पढ़ नहीं सका उन के लम्स महसूस कर...

उदास नहीं – गुलज़ार 0

उदास नहीं – गुलज़ार

बस एक चुप-सी लगी है, नहीं उदास नहीं कहीं पे साँस रुकी है, नहीं उदास नहीं कोई अनोखी नहीं ऐसी ज़िंदगी लेकिन मिली जो, ख़ूब मिली है, नहीं उदास नहीं सहर भी, रात भी,...

साँस लेना भी कैसी आदत है – गुलज़ार 0

साँस लेना भी कैसी आदत है – गुलज़ार

साँस लेना भी कैसी आदत है जीये जाना भी क्या रवायत है कोई आहट नहीं बदन में कहीं कोई साया नहीं है आँखों में पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं इक सफ़र है जो...

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं – गुलज़ार 0

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं – गुलज़ार

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा अगरचे एहसास कह रहा है खुले दरीचे...

नज़्म उलझी हुई है सीने में – गुलज़ार 0

नज़्म उलझी हुई है सीने में – गुलज़ार

नज़्म उलझी हुई है सीने में मिसरे अटके हुए हैं होठों पर उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम सादे काग़ज़ पे लिखके...