Category: Kavishala

भारत की ‘इंकलाबी आवाज’ 0

भारत की ‘इंकलाबी आवाज’

ओ भारत के लोगों ! क्यों बैठे हो धरे हाँथ तुम्हारा गर्जन सुनने के लिए बाट जोह रहा है नाथ (राष्ट्र) ।   कर प्रयोग अपनी युद्ध भरी आवाज बरछी,भाला, खडग, बारूद की तरह...

तेरा-मेरा आसमाँ 0

तेरा-मेरा आसमाँ

तुम्हारा भी उतना ही आसमां है जितना कि मेरे पास है फिर तुम खुशी से झूमते हो क्यूँ और मेरा दिल क्यूँ उदास है मंजिल के लिए साथ चले साथ ही हम दोनों आगे...

गरीब आदमी …. 0

गरीब आदमी ….

खाली जेब जाता है ,तो …बाजार से डरता है.. गरीब आदमी तो हर …त्योहार से डरता है … अर्जी करने भी चला जाता …कभी वो वहाँ … चढ़ानी पड़ेगी चादर ..इसलिए माजार से डरता...

सोन मछरिया 0

सोन मछरिया

सोन मछरिया     ये क्या तरल है जो मेरे फेफड़ों के अंदर-बाहर बना हरकारा  है तुम्हारी चाह की साँसे हैं फेफड़ो में धधकती दुबारा तिबारा चौबारा है   तालाब में भी कुछ न...

मिला नहीं एक सच्चा इंसान 0

मिला नहीं एक सच्चा इंसान

ढूंढने निकला मैं जो एक इंसा मन्दिर ढूंढा मस्जिद ढूंढा गिरजा ढूंढा और ढूंढा गुरुद्वारे भगवान मिला कुछ शांत सा मिले शास्त्रों के ज्ञाता बहोत कुरान कठंस्थ मौलवी शब्द गुरबानी के सुनाते ग्रन्थी बाईबल...

Haan mai Aazad Hindustan likhane aaya hun 0

Haan mai Aazad Hindustan likhane aaya hun

भूखे, गरीब, बेरोजगार, अनाथो और लाचार की दास्तान लिखने आया हूँ  हाँ मैं आजाद हिंदुस्तान लिखने आया हूँ|  एक ही कपड़े में सारे मौसम गुजारनेवाले  सूखा, बाढ़ और ओले से फसल बर्बाद होने पर...

क्यों मुल्क़ मेरा परेशान दिखाई देता है……? 0

क्यों मुल्क़ मेरा परेशान दिखाई देता है……?

क्यों मुल्क़ मेरा परेशान दिखाई देता है, हर बाशिंदा हैरानदिखाई देता है। है सबकी परेशानी अपनी-अपनी फिर भी, मुझमें शक का सामान दिखाई देता है। इस मुल्क़ की हिफाजत जिन हाथों में सौंपी है,...

आजाद आवाजें 0

आजाद आवाजें

तुम कलम तोड़ दो, किताब फाड़ दो, या सर फोड़ दो, होंठ सी दो, जुबाँ काट दो, या माइक, जबड़ा तोड़ दो, फिर भी, जहाँ पहुँचनी है, वहाँ पहुंचेगी- आजाद आवाजें!

अमिताभ : एक पिता की नज़र से 0

अमिताभ : एक पिता की नज़र से

अमिताभ : एक पिता की नज़र से कविवर हविरवंशराय बच्चन की आत्मकथा पढ़ते हुए ऐसे बहुत से रोचक प्रसंग आते हैं जो अमिताभ से जुड़े हैं और क्यों न हो, पिता का पुत्र पर...

यूं ही हुआ नहीं खारा है समंन्दर 0

यूं ही हुआ नहीं खारा है समंन्दर

तन्हाइयां ये कैसी, जिंदगी बन गई चुराकर सवेरे सभी अंखियों से मेरी राते हैं काली हमदम बन गई ।। तन्हां हुआ में जैसे गहरा समंन्दर नदियां थी जो दिल का हाल पुछती वो नदियां...