Category: Jaivardhan Dhaka

मिटाता हूँ जज्बातों को क्यों फिर से उठ जाते है 0

मिटाता हूँ जज्बातों को क्यों फिर से उठ जाते है

मिटाता हूँ जज्बातों को क्यों फिर से उठ जाते है बेकाबु से , बेनकाब से क्यू हर बार हो जाते है बिना लहरों के समंदर में अक्सर मुझे डुबोते है दुनिया के चाल चलन...