Category: Dipika Dalakoti Dobriyal

मेरे ख्वाब में नानी आई थी! 0

मेरे ख्वाब में नानी आई थी!

जब थोड़ी परेशान थी मैं, मेरे ख्वाब में नानी आई थी देखी मुझको रोते हुए जब मुझको एक गीत सुनाई थी… याद है मुझको गीत वो माँ जो नानी नें मुझे सुनाया था वो...

मिट्टी 0

मिट्टी

छाप बनी थी संगमरमर पर क्या घर  भीतर कोई आया है इतने बरस बाद शहर में, गाँव की मिट्टी लाया है   लगता है कुछ दूर गाँव में बारिश ने रंगमंच बनाया है उन्हीं...

कुछ दिनों से जहन में उफान मारती कविता 0

कुछ दिनों से जहन में उफान मारती कविता

कुछ दिनों से जहन में उफान मारती कविता दिल में उठते तूफान की सार्थि कविता चन्द शब्द लिखने थे- पन्ना गीला हो गया, अब कलम को फिसलने से कैसे संभालती कविता…   एक रोज़...

ज़िंदगी में मुहब्बत ज़िंदगी में खुदाई है! 1

ज़िंदगी में मुहब्बत ज़िंदगी में खुदाई है!

कैसे कहूँ मुहब्बत का काम ना होगा, अभी तो ज़िंदगी का खुदा से सामना होगा! इस कदर कहेगा वो दास्ताँ अपनी, मानो बंदे को मिलने के अलावा खुदा का कुछ और काम ना होगा…...

गुनगुनी धूप 0

गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप के कंबल सी बनी हवा- मर्तबानो में अचारों को कुछ सहलाएगी … कुछ समय पहले रंगी होली के मदहोश ये रंग- अब चटपटी बर्फ़ीली चुस्कियाँ चुराएंगी… एक नये रूप में सजाने को यह नव ऋतु, सूत की थाने बाज़ारों में खुल जाएंगी! या यह भी हो सकता है कि कुछ नाज़नीन, कई और झीनी परतों में नज़र आएंगी… फूलों की महक हवाओं में सांस छोड़ेगी… फिर तितलियाँ गुलाबों को गुदगुदाएंगी… गहरी साँस भरेंगे मजबूरी में जी… कुदरत इत्र की शीशियाँ जब फुसफुसएगी! कहीं आम के बौर की सौंधी सुरभि- खास इस मौसम में पुनःजन्म पाएंगी! कहीं तोतों की नुकिली सी चोंच, फलों को कुतरता हुआ आप पाएंगी… देख लेंगे इस मौसम के तेवर भी हम, सब तरफ ग्रीष्म जब  छींटे बिखराएगी… सफ़र करते राह मैं यह आलम होगा कुछ दूरी पे मृघ्मारीचिका सी बनती जाएँगी पहाड़ी...

प्रकृति के इशारे 0

प्रकृति के इशारे

शायद धरती ले रही थी करवट कहीं- क्षितिज की ओर जब निगाहें डाली… निशा विदाई लेती सी देखी मैंने, अब सामने रंगी ऊषा की लाली. नींद की गुदगुदी पानी को सौंपी- फिर कदम बड़े...

आज़ादी का त्यौहार 0

आज़ादी का त्यौहार

  होली बैसाखी गुरु पूर्णिमा गये आज यह त्यौहार भी आया है जिस दिन को सार्थक करने के लिए कभी लाखों नें खून बहाया है   कुछ वीरों की हिम्मत बदौलत भारत मानता आज़ादी के मेले है नयी पीडियों को आज़ादी देने को काई गुमनामो नें अत्याचार झेले हैं   ख़याल आता है मन में कभी कैसे अंदाज़ वो जिगर रहे भगत सिंह जैसे अभिमन्यु भारत से जाने किधर गये?   केसरिये और हरे के बीच पट्टी तो सफेद हे जचती है पर सफेद बरफ की परतों को अब धाराएं खून की ढकती हैं!   बचपन से सुनते आए हैं धरती का स्वर्ग है कश्मीर अब उस स्वर्ग की गर्दन में मानो तलवार लटकती है   कभी सोचा इसी भूमि को .ही क्यों राम कन्हैय्या नें चुना कभी सोचा मात्र साँसों की डोरी से यहीं बुद्ध नें महानिर्वाणबुना   वो मुक्त हे थे और मुक्त रहे उस आज़ादी  के क्या कहने वो  भीतर  की लगन को ही...

वृद्ध और बुद्ध 0

वृद्ध और बुद्ध

मुरझाई नदी की छाया सा – सरिता  का दरदरा रेता , सिकुड़ा हुआ, सिमटा हुआ, था सूखी चाह समेटा;   था वो धरातल कोई? या गहरी सिलवट का  वो डेरा ? दिलाता याद मुझको क्यों? असल में वृद्ध का चेहरा!   उनमें लकीरें भी गहरी थीं, और उनका घाव भी गहरा, तजुर्बे की मलहम भी थीं, और उसमें भाव भी ठहरा;     मानो जड़ो ने जकड़ा हो, और उन पर समय का हो पहरा, झुरियों की कतार से...

आज कल गर्मियों का ताप इतना क्यों बढ़ा? 0

आज कल गर्मियों का ताप इतना क्यों बढ़ा?

कुछ साल से मैं हूँ यही सोच में पड़ा, आज कल गर्मियों का ताप इतना क्यों बढ़ा? क्या बात है मौसम का चक्र उखड़ा हुआ सा है… क्या बात है की कैलंडर का मुखड़ा...

कुछ सारंगी की रंगी धुन 0

कुछ सारंगी की रंगी धुन

कुछ सारंगी की रंगी धुन कुछ संतूर का गुंजन धड़कती ताल मृदंग की उसमें बाँसुरी का संग कभी पैरों की थप थप की कभी अंगुली से इशारे कर एक अद्भुत मूर्ति श्रद्धा की जो...

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