Category: Bhupesh Dixit

सैर 0

सैर

शाम को जब हम सैर को जाते है थके – मांदें शरीर से भेंट कर जाते कुछ पसीने से तर-बतर कुछ धुंए में जकड़े होते है तो कुछ नशे में डूबे होते है, काम...

सत्य की पुकार 0

सत्य की पुकार

कलम से बात क्या निकली सरकार सफाई देने पर आ गयी सच की एक आवाज़ क्या उठी हुकुमरानों की भृकुटियां तान खा गयी गांठें अब जो खुल रही है तो शिखाएं तो लहरायेगी चंडी...

मैं देख रहा हूँ उसे… 0

मैं देख रहा हूँ उसे…

मैं देख रहा था उसे रोज़ खुद से झूझते हुए झुके काँधों पर परिवार का बोझ लिए हुए, दबे होठों पे मुस्कान लिए हुए, अँधेरे में चमकने की कोशिश करते हुए, टूटते – बिखरते...

वर्तमान 0

वर्तमान

वर्तमान बस यही है हम दोनों का तू एक जर्जर होती हवेली है और मैं तेरा बूढ़ा द्वारपाल कि अब, हमारे कबूतर आँगन में नहीं आते, दाना नहीं खाते, गुटर-गूँ कर जीवन का राग...

स्वयं से साक्षात्कार 0

स्वयं से साक्षात्कार

क्यों भटक रहा है तू , अनजान की तलाश में, आडम्बर की चाल में, माया के जाल में, खोल मन के द्वार तू, सुन सच की पूकार तू, निचोड़ अपनी खामियाँ, उपज अपनी खूबियाँ,...

जानती हूँ मैं 0

जानती हूँ मैं

जानती हूँ मैं तुम अपने सारे पाप मुझपे मढ़ने आये हो मेरे जिस्म को मैला कर अपनी रूह पवित्र करने आये हो फिर भी मैं, पहले तुम्हारे चरण स्पर्श करुँगी फिर स्वयं में डुबो...

शैय्या के सिरहाने 0

शैय्या के सिरहाने

डरे सहमे मासूम मन में असंख्य असहनीय पीड़ाएं करवटें लेती है भिंची हुई मुट्ठियों में उम्मीदें साँसे भरती है दुआओं के साथ सुइयां चुभती है नसों में पूर्ण से सम्पूर्ण की इस यात्रा में...

आओ बात करें 0

आओ बात करें

यूँ गुमशुम रहना ठीक नहीं आओ बात करें मन में दबी जो बातें है उनको साझा स्वीकार करें जो बीत गया उसको अब दरकिनार करें नवसेज तैयार करें आओ बात करें मौनी बोल रहे है...

“मेरे आराध्य” 0

“मेरे आराध्य”

एक लौ जलाता हूँ, संकल्प दोहराता हूँ भस्म करके स्वयं को, मैं तुम्हें देख पाता हूँ ज्यों – ज्यों विकार जले तुम और उजले होते जाते हो शरण में तुम्हारी आता हूँ, मन-मुक्ति पाता...

“ठूँठ” 0

“ठूँठ”

कट गया पेड़ शेष रह गया ठूँठ गई इसकी समस्त कला गया है सकल साज। अब यह वसंत में नहीं मचलता, धनुष-सा नहीं झुकता, चलते नहीं अब इसकी छाँव में काम के नयन-तीर, झरते...