Category: नीतू सिंह रेणुका

ऐ देश मेरे! 0

ऐ देश मेरे!

ऐ देश मेरे!   ऐ देश मेरे! तेरा रंग निराला है। मगर क्या तू कभी आगे बढ़ने वाला है? क्योंकि तेरे हर शुभ काम से पहले तुझे यहाँ की औरतों अपनी हाय लगाती हैं...

कार्यालयीन मृत्यु 0

कार्यालयीन मृत्यु

बूंदों ने डाक से प्रेषित किया है बादलों ने जो मसौदा दिया था बनाकर आकाश में मेरी मौत का आदेश पत्र छपा है काल ने बिजलियों से किए हैं हस्ताक्षर   प्रकृति ने इस...

फ्लैट 0

फ्लैट

फ्लैट   जहां छत न हो, आंगन न हो, बुजुर्गों से ड्योढी पावन न हो उसे फ्लैट कहते हैं   जहां खाट न बिछती हो जहां सीढ़ी न लगती हो उसे फ्लैट कहते हैं...

काहिल 0

काहिल

काहिल   जब घर बैठे प्रसाद मिले तो कोई मंदिर क्यों जाए जब मस्त बयार बहे तो पंखा कोई क्यों हिलाए काम कभी कोई रूका नहीं फिर क्यों काम करते जाएं ऐसा करें कि...

मेरा भगवान भी तो मुझसा भोला है 0

मेरा भगवान भी तो मुझसा भोला है

मेरा भगवान भी तो मुझसा भोला है माखन खिलाऊँ तो खाता है जहाँ झुलाऊँ झूल जाता है जब सुलाऊँ सो लेता है जब रुलाऊँ रो लेता है जो पिलाऊँ पी लेता है जैसे जिलाऊँ...

तेरा-मेरा आसमाँ 0

तेरा-मेरा आसमाँ

तुम्हारा भी उतना ही आसमां है जितना कि मेरे पास है फिर तुम खुशी से झूमते हो क्यूँ और मेरा दिल क्यूँ उदास है मंजिल के लिए साथ चले साथ ही हम दोनों आगे...

उलझन 0

उलझन

जाने किस उलझन में है मन कभी इधर भागता है कभी उधर घने बेर की ठंडी छाँव अच्छी लगे तो कभी रुपहली सी दोपहर किस धूप-छाँव में है मन कभी इधर भागता है कभी...

तुम बिन 0

तुम बिन

तुम बिन जब आधा जीवन कट ही गया बाकी पल भी तुम बिन कट जाएँगे इंतजार के खेत आधे पाटे मैंने बाकी भी मेरे आंसुओं से पट जाएँगे आधे सपने पलकों से झड़ गए...

सोन मछरिया 0

सोन मछरिया

सोन मछरिया ये क्या तरल है जो  मेरे फेफड़ों के अंदर-बाहर बना हरकारा है तुम्हारी चाह की साँसे हैं फेफड़ो में धधकती दुबारा तिबारा चौबारा है     तालाब में भी कुछ न कुछ...

क्योंकि मैं औरत हूँ 0

क्योंकि मैं औरत हूँ

क्योंकि मैं औरत हूँ? मेरी ज़िन्दगी की मैं ख़ुद मालिक नहीं क्योंकि मैं औरत हूँ। बाप, भाई, पति, बेटा ठेकेदार हैं कई क्योंकि मैं औरत हूँ। मेरा तो अपना दिमाग़ ही नहीं क्योंकि मैं...