Ahmad Nadeem Qasmi

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

Ahmad Nadeem Qasmi (1916–2006) was an Urdu and English language Pakistani poet, journalist, literary critic, dramatist and short story author.


Ahmad Nadeem Qasmi (Urdu: احمد ندیم قاسمی‬‎) born Ahmad Shah Awan (Urdu: احمد شاہ اعوان‬‎) on 20 November 1916 – died 10 July 2006, was an Urdu and English language Pakistani poet, journalist, literary critic, dramatist and short story author. He wrote 50 books on topics such as poetry, fiction, criticism, journalism and art, and was a major figure in contemporary Urdu literature.His poetry was distinguished by its humanism, and his Urdu afsana (short story) work is considered by some second only to Prem Chand in its depiction of rural culture. He was also editor and publisher of the literary magazine Funoon for almost half a century. He received awards such as the Pride of Performance in 1968 and Sitara-e-Imtiaz in 1980 for his literary work.

Qasmi was born in the village of Anga in Khushab District, British India. He graduated from a high school in Campbellpur in 1931, (now renamed Attock city in Pakistan), around the time when he wrote his first poem. Later he studied at Sadiq Egerton College in Bahawalpur. He graduated from the University of the Punjab, Lahore in 1935. He had a brother, Peerzada Mohammad Bakhsh Qasmi, and a sister. He became an active member of the Progressive Writers Movement as a secretary, and was consequently arrested many times during the 1950s and 1970s. He died on 10 July 2006 of complications from asthma at Punjab Institute of Cardiology in Lahore.
Qasmi had a long career as a writer and editor. He edited several prominent literary journals, including Phool, Tehzeeb-i-Niswaan, Adab-i-Lateef, Savera, Naqoosh, and his own journal, Funoon. He also worked as the editor of the Urdu daily Imroze. Qasimi contributed weekly columns to national newspapers like Rawan Dawan and Daily Jang for several decades. His poetry has included both traditional ghazals and modern nazms.

In 1948, he was selected as the secretary general of the Anjuman-e-Taraqqi Pasand Musannifeen (Progressive Writers Movement) for Punjab. In 1949, he was elected the secretary-general of the organisation for Pakistan. In 1962, Qasmi published his own literary magazine Fanoon, with the support of writers and poets including Khadija Mastoor, Hajra Masroor, Ahmed Faraz, Amjad Islam Amjad, Ata ul Haq Qasmi, and Munnu Bhai . Qasami was the mentor of poet Parveen Shakir. In 1974, he was appointed secretary-general of Majlis-Taraqee-Adab, a literary body established by the government of West Pakistan in 1958.

In December 2011, Professor Fateh Muhammad Malik and noted columnist Ata ul Haq Qasmi arranged a seminar on the life and achievements of Ahmad Nadeem Qasmi at the International Islamic University, Islamabad. His literary work has been appreciated and admired by Urdu writers, poets and critics, although there is also criticism of his literary work and of his personality. Fateh Muhammad Malik is a long-time friend of Ahmed Nadeem Qasmi. In his book about the life and personality of Ahmed Nadeem Qasmi called ‘Nadeem Shanasi’, he gives the impression that it is evident from Qasmi’s letters to him that Qasmi had a buried disliking for Faiz and perhaps considered himself a poet greater than Faiz. “The letters also reveal that Qasmi had a narcissistic personality and an inflated ego when it came to his contemporaries. He consciously or unconsciously tried to belittle Faiz, though without much effect.”

Ahmad Nadeem Qasmi’s poetry 

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था – अहमद नदीम क़ासमी

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था देखा निकल के घर से तो झोंका हवा का था इस हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़ पे लुट कर भी शाद हूँ तेरी रज़ा जो थी वो तक़ाज़ा वफ़ा का था दिल...

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अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था – अहमद नदीम क़ासमी

अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था गुलाब जैसे कड़ी धूप के अलाव में था है जिस की याद मिरी फ़र्द-ए-जुर्म की सुर्ख़ी उसी का अक्स मिरे एक एक घाव में था यहाँ...

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अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के – अहमद नदीम क़ासमी

अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के कि मुस्कुराया ख़ुदा भी सितारा वा कर के गदा-गरी भी इक उस्लूब-ए-फ़न है जब मैं ने उसी को माँग लिया उस से इल्तिजा कर के शब-ए-फ़िराक़...

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अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की – अहमद नदीम क़ासमी

अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की अपनी पोशाक से हुश्यार कि ख़ुद्दाम-ए-क़दीम धज्जियाँ माँगते हैं अपने गरेबानों की सनअतें फैलती जाती हैं मगर इस...

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तंग आ जाते हैं दरिया जो कुहिस्तानों में – अहमद नदीम क़ासमी

तंग आ जाते हैं दरिया जो कुहिस्तानों में साँस लेने को निकल जाते हैं मैदानों में ख़ैर हो दश्त-ए-नवर्दान-ए-मोहब्बत की अब शहर बस्ते चले जाते हैं बयाबानों में अब तो ले लेता है बातिन...

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उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे – अहमद नदीम क़ासमी

उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे वो जो इस दश्त के उस पार से लाया है मुझे कितने आईनों में इक अक्स दिखाया है मुझे ज़िंदगी ने जो अकेला कभी पाया...

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वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे – अहमद नदीम क़ासमी

वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे शजर से टूट के जो फ़स्ल-ए-गुल पे रोए थे अभी अभी तुम्हें सोचा तो कुछ न याद आया अभी अभी तो हम इक दूसरे से...

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यूँ तो पहने हुए पैराहन-ए-ख़ार आता हूँ – अहमद नदीम क़ासमी

यूँ तो पहने हुए पैराहन-ए-ख़ार आता हूँ ये भी देखो कि ब-सौदा-ए-बहार आता हूँ अर्श से जब नहीं उठती मिरी फ़रियाद की गूँज मैं तुझे दिल के ख़राबे में पुकार आता हूँ मुझे आता...

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फ़ासले के मअ’नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो – अहमद नदीम क़ासमी

फ़ासले के मअ’नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो जितने दूर जाते हो उतने पास आते हो रात टूट पड़ती है जब सुकूत-ए-ज़िंदाँ पर तुम मिरे ख़यालों में छुप के गुनगुनाते हो मेरी ख़ल्वत-ए-ग़म के...

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एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का – अहमद नदीम क़ासमी

एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का इल्ज़ाम न धर इश्क़ पे शोरीदा-सरी का इस वक़्त मिरे कल्बा-ए-ग़म में तिरा आना भटका हुआ झोंका है नसीम-ए-सहरी का तुझ से तिरे कूचे का पता पूछ रहा...

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एहसास में फूल खिल रहे हैं – अहमद नदीम क़ासमी

एहसास में फूल खिल रहे हैं पतझड़ के अजीब सिलसिले हैं कुछ इतनी शदीद तीरगी है आँखों में सितारे तैरते हैं देखें तो हवा जमी हुई है सोचें तो दरख़्त झूमते हैं सुक़रात ने...

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दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई – अहमद नदीम क़ासमी

दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई कोई निगाह पस-ए-गर्द-ए-कारवाँ न गई वो और चीज़ है होते हैं जिस से दिल शादाब तिरी बहार से वीरानी-ए-ख़िज़ाँ न गई निकल के ख़ुल्द से भी आदमी न पछताया...

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दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने – अहमद नदीम क़ासमी

दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने दुनिया का मगर रूप बढ़ाया तिरी छब ने तू नींद में भी मेरी तरफ़ देख रहा था सोने न दिया मुझ को सियह-चश्मी-ए-शब ने हर ज़ख़्म पे...

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बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था – अहमद नदीम क़ासमी

बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था ये भी तिलिस्म-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार था कहते हैं लोग औज पे था मौसम-ए-बहार दिल कह रहा है अरबदा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार था अब तो विसाल-ए-यार से बेहतर है याद-ए-यार मैं भी...

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अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या – अहमद नदीम क़ासमी

अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या दश्त में आज भी उठते हैं बगूले क्या क्या इश्क़ मे’आर-ए-वफ़ा को नहीं करता नीलाम वर्ना इदराक ने दिखलाए थे रस्ते क्या क्या ये अलग...

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