रघुवीर सहाय

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

रघुवीर सहाय(१९२९- १९९०) हिन्दी के साहित्यकार व पत्रकार थे।


Raghuvir-Sahay kavishala

रघुवीर सहाय का जन्म लखनऊ में हुआ था। अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए (१९५१) लखनऊ विश्वविद्यालय। साहित्य सृजन १९४६ से। पत्रकारिता की शुरुआत दैनिक नवजीवन (लखनऊ) से १९४९ में। १९५१ के आरंभ तक उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता। इसी वर्ष दिल्ली आए। यहाँ प्रतीक के सहायक संपादक (१९५१-५२), आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक (१९५३-५७)। १९५५ में विमलेश्वरी सहाय से विवाह।

दूसरा सप्तक, सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो (कविता संग्रह), रास्ता इधर से है (कहानी संग्रह), दिल्ली मेरा परदेश और लिखने का कारण (निबंध संग्रह) उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।

इसके अलावा ‘बारह हंगरी कहानियाँ’, विवेकानंद (रोमां रोला), ‘जेको’, (युगोस्लावी उपन्यास, ले० येर्ज़ी आन्द्र्ज़ेएव्स्की , ‘राख़ और हीरे'( पोलिश उपन्यास ,ले० येर्ज़ी आन्द्र्ज़ेएव्स्की) तथा ‘वरनम वन'( मैकबेथ, शेक्सपियर ) शीर्षक से हिन्दी भाषांतर भी समय-समय पर प्रकाशित हुए हैं।

रघुवीर सहाय समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं। उनके साहित्य में पत्रकारिता का और उनकी पत्रकारिता पर साहित्य का गहरा असर रहा है। उनकी कविताएँ आज़ादी के बाद विशेष रूप से सन् ’60 के बाद के भारत की तस्वीर को समग्रता में पेश करती हैं। उनकी कविताएँ नए मानव संबंधों की खोज करना चाहती हैं जिसमें गैर बराबरी, अन्याय और गुलामी न हो। उनकी समूची काव्य-यात्रा का केंद्रीय लक्ष्य ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था की निर्मिति है जिसमें शोषण, अन्याय, हत्या, आत्महत्या, विषमता, दासता, राजनीतिक संप्रभुता, जाति-धर्म में बँटे समाज के लिए कोई जगह न हो। जिन आशाओं और सपनों से आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई थी उन्हें साकार करने में जो बाधाएँ आ रही हों, उनका निरंतर विरोध करना उनका रचनात्मक लक्ष्य रहा है। वे जीवन के अंतिम पायदान पर खड़े होकर अपनी जिजीविषा का कारण ‘अपनी संतानों को कुत्ते की मौत मरने से बचाने’ की बात कहकर अपनी प्रतिबद्धता को मरते दम तक बनाए रखते हैं।

रघुवीर सहाय की कवितायें 

सभी लुजलुजे हैं – रघुवीर सहाय

खोंखियाते हैं, किंकियाते हैं, घुन्‍नाते हैं चुल्‍लु में उल्‍लू हो जाते हैं मिनमिनाते हैं, कुड़कुड़ाते हैं सो जाते हैं, बैठ जाते हैं, बुत्ता दे जाते हैं झांय झांय करते है, रिरियाते हैं, टांय टांय...

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बैंक में लड़कियाँ – रघुवीर सहाय

बैंक में लड़कियाँ बड़ी होती जाती हैं और इतनी भीड़ से घिरी हुई एकाकी वह अपने तीस बरस औरत और व्यक्ति के बनने के तीस बरस लिए हुए रोज़ यहाँ आती हैं वक्त से...

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डर – रघुवीर सहाय

बढ़िया अँग्रेज़ी वह आदमी बोलने लगा जो अभी तक मेरी बोली बोल रहा था मैं डर गया ।

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मेरी स्त्री – रघुवीर सहाय

प्यारे दर्शको, यह जो स्त्री आप देखते हैं सो मेरी स्त्री है इसकी मुझसे प्रीति है । पर यह भी मेरे लिए एक विडम्बना है क्योंकि मुझे इसकी प्रीति इतनी प्यारी नहीं जितनी यह...

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आज फिर शुरू हुआ – रघुवीर सहाय

आज फिर शुरू हुआ जीवन आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया आज एक छोटी-सी बच्ची आई,किलक...

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बसन्त आया – रघुवीर सहाय

जैसे बहन ‘दा’ कहती है ऐसे किसी बँगले के किसी तरु( अशोक?) पर कोइ चिड़िया कुऊकी चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले ऊँचे तरुवर से गिरे बड़े-बड़े पियराये पत्ते कोई...

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मत पूछना – रघुवीर सहाय

मत पूछना हर बार मिलने पर कि “कैसे हैं” सुनो, क्या सुन नहीं पड़ता तुम्हें संवाद मेरे क्षेम का, लो, मैं समझता था कि तुम भी कष्ट में होंगी तुम्हें भी ज्ञात होगा दर्द...

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इतने शब्द कहाँ हैं – रघुवीर सहाय

इतने अथवा ऐसे शब्द कहाँ हैं जिनसे मैं उन आँखों कानों नाक दाँत मुँह को पाठकवर आज आप के सम्मुख रख दूँ जैसे मैंने देखा था उनकों कल परसों। वह छवि मुझ में पुनरुज्जीवित...

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जब मैं तुम्हें – रघुवीर सहाय

जब मैं तुम्हारी दया अंगीकार करता हूँ किस तरह मन इतना अकेला हो जाता है? सारे संसार की मेरी वह चेतना निश्चय ही तुम में लीन हो जाती होगी । तुम उस का क्या...

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पानी – रघुवीर सहाय

पानी का स्वरूप ही शीतल है बाग में नल से फूटती उजली विपुल धार कल-कल करता हुआ दूर-दूर तक जल हरी में सीझता है मिट्टी में रसता है देखे से ताप हरता है मन...

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यही मैं हूँ – रघुवीर सहाय

यही मैं हूँ और जब मैं यही होता हूँ थका, या उन्हीं के से वस्त्र पहने, जो मुझे प्रिय हैं- दुखी मन में उतर आती है पिता की छवि अभी तक जिन्हें कष्टों से...

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आओ, जल भरे बर्तन में – रघुवीर सहाय

आओ, जल भरे बर्तन में झाँकें साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ चौंककर हम अलग-अलग हो जाएंगे जैसे अब, तब भी मिलाएंगे आँखें, आओ पैठी हुई जल में चाया साथ-साथ भींगे झुके...

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दे दिया जाता हूँ – रघुवीर सहाय

मुझे नहीं मालूम था कि मेरी युवावस्था के दिनों में भी यानी आज भी दृश्यालेख इतना सुन्दर हो सकता है : शाम को सूरज डूबेगा दूर मकानों की कतार सुनहरी बुंदियों की झालर बन जाएगी...

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आनेवाला कल – रघुवीर सहाय

मुझे याद नहीं रहता है वह क्षण जब सहसा एक नई ताकत मिल जाती है कोई एक छोटा-सा सच पकडा जाने से वह क्षण एक और बडे सच में खो जाता है मुझे एक...

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प्रभाती – रघुवीर सहाय

आया प्रभात चन्दा जग से कर चुका बात गिन-गिन जिनको थी कटी किसी की दीर्घ रात अनगिन किरणों की भीड़भाड़ से भूल गए पथ, और खो गए, वे तारे। अब स्वप्नलोक के वे अविकल...

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