बृज नारायण चकबस्त

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

ब्रजनारायण चकबस्त (1882–1926) उर्दू कवि थे।


Chakbast-Brij-Narayan kavishala

वे प्रसिद्ध तथा सम्मानित कश्मीरी परिवार के थे। यद्यपि इनके पूर्वज लखनऊ के निवासी थे तथापि इनका जन्म फैजाबाद में सन्‌ 1882 ई. में हुआ था। इनके पिता पं॰ उदित नारायण जी इनकी अल्पावस्था ही में गत हो गए। इनकी माता तथा बड़े भाई महाराजनारायण ने इन्हें अच्छी शिक्षा दिलाई, जिससे ये सन्‌ 1907 ई. में वकालत परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सफल वकील हुए। ये समाजसुधारक थे और सेवाकार्यो में सदा संनद्ध रहा करते थे। उर्दू कविता भी करने लगे थे और शीघ्र ही इसमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर ली कि उर्दू के कवियों की प्रथम पंक्ति में इन्हें स्थान मिल गया। एक मुकदमे से रायबरेली से लौटते समय 12 फ़रवरी सन्‌ 1926 ई. को स्टेशन पर ही फालिज का ऐसा आक्रमण हुआ कि कुछ ही घंटों में इनकी मृत्यु हो गई। इनकी मृत्यु से उर्दू भाषा तथा कविता को विशेष क्षति पहुँची।

चकबस्त लखनऊ के व्यवहार आदि के अच्छे आदर्श थे। इनके स्वभाव में ऐसी विनम्रता, मिलनसारी, सज्जनता तथा सुव्यवहारशीलता थी कि ये सर्वजन प्रिय हो गए थे। धार्मिक कट्टरता इनमें नाम को भी नहीं थी। इन्होंने पूर्ववर्ती कवियों की उर्दू कविताएँ बहुत पढ़ी थी और इनपर अनीस, आतिश तथा गालिब का प्रभाव अच्छा पड़ा था। उर्दू में प्राय: कविगण गजलों से ही कविता करना आरंभ करते हैं परंतु इन्होंने नज्म द्वारा आपनी कविता आरंभ की और फिर गज़लें भी ऐसी लिखीं जो उर्दू काव्यक्षेत्र में अपना जोड़ नहीं रखती। इनकी कविता में बौद्धिक कौशल अधिक है अर्थात्‌ केवल सुनकर आनंद लेने योग्य नहीं है प्रत्युत्‌ पढ़कर मनन करने योग्य है। इन्होंने अपने समय के नेताओं के जो मर्सिए लिखे हैं उन्हें पढ़ने से पाठकों के हृदय में देशभक्ति जाग्रत होती है। दृश्यवर्णन भी इनका उच्च कोटि का हुआ है और इसके लिये भाषा भी साफ सुथरी रखी है। इनकी वर्णनशैली में लखनऊ की रंगीनी तथा दिल्ली की सादगी और प्रभावोत्पादकता का सुंदर मेल है। उपदेश तथा ज्ञान की बातें भी ऐसे अच्छे ढंग से कहीं गई हैं कि सुननेवाले ऊबते नहीं।

पद्य के सिवा गद्य भी इन्होंने बहुत लिखा है, जो मुजामीने चकबस्त में संगृहीत हैं। इनमें आलोचनात्मक तथा राष्ट्रोन्नति संबंधी लेख हैं जो ध्यानपूर्वक पढ़ने योग्य है। गंभीर, विद्वत्तापूर्ण्‌ तथा विशिष्ट गद्य लिखने का इन्होंने नया मार्ग निकाला और देश की भिन्न भिन्न जातियों में तथा व्यवहार का संबंध दृढ़ किया। सुबहे वतन में इनकी कविताओं का संग्रह है। इन्होंने कमला नामक एक नाटक लिखा है।

बृज नारायण चकबस्त की कवितायें 

एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे – बृज नारायण चकबस्त

एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे, साक़िया जाते हैं, महफ़िल तेरी आबाद रहे। बाग़बाँ दिल से वतन को ये दुआ देता है, मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे। मुझको...

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ख़ाके-हिन्द (भारत की रज) – बृज नारायण चकबस्त

अगली-सी ताज़गी है फूलों में और फलों में करते हैं रक़्स  अब तक ताऊस  जंगलों में अब तक वही कड़क है बिजली की बादलों में पस्ती-सी  आ गई है पर  दिल के हौसलों में गुल शमअ-ए-अंजुमन  है,गो  अंजुमन   वही है हुब्बे-वतन  नहीं है, ख़ाके-वतन वही...

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ज़ुबाँ को बन्द करें या मुझे असीर करें – बृज नारायण चकबस्त

ज़ुबाँ को बन्द करें या मुझे असीर करें मेरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते । ये कैसी बज़्म[1] है और कैसे इसके साक़ी[2] हैं शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते ।...

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पयामे-वफ़ा – बृज नारायण चकबस्त

हो चुकी क़ौम के मातम में बहुत सीनाज़नी अब हो इस रंग का सन्यास[3]ये है दिल में ठनी मादरे-हिन्द की तस्वीर हो सीने पे बनी बेड़ियाँ पैर में हों और गले में क़फ़नी हो...

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कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पै भी – बृज नारायण चकबस्त

कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पै भी पर अब उरूज वो इल्मो कमालो फ़न में नहीं । रगों में ख़ून वही दिल वही जिगर है वही वही ज़बाँ है मगर वो असर...

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दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना – बृज नारायण चकबस्त

दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना आदमियत यही है और यही इन्साँ होआ नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ क्या जानें कोई नाशाद सिखा दे इन्हें नालाँ होना रह के दुनिया में यूँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह् अपने ही...

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