परवीन शाकिर

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

सैयदा परवीन शाकिर(1952–1994) उर्दू कवयित्री थीं।


Parveen-Shakir kavishala

सैयदा परवीन शाकिर (उर्दू: پروین شاکر नवंबर 1952 – 26 दिसंबर 1994), एक उर्दू कवयित्री, शिक्षक और पाकिस्तान की सरकार की सिविल सेवा में एक अधिकारी थीं। इनकी प्रमुख कृतियाँ खुली आँखों में सपना, ख़ुशबू, सदबर्ग, इन्कार, रहमतों की बारिश, ख़ुद-कलामी, इंकार(१९९०), माह-ए-तमाम (१९९४) आदि हैं।वे उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी शायरी का केन्द्रबिंदु स्त्री रहा है। फ़हमीदा रियाज़ के अनुसार ये पाकिस्तान की उन कवयित्रियों में से एक हैं जिनके शेरों में लोकगीत की सादगी और लय भी है और क्लासिकी संगीत की नफ़ासत भी और नज़ाकत भी। उनकी नज़्में और ग़ज़लें भोलेपन और सॉफ़िस्टीकेशन का दिलआवेज़ संगम है। पाकिस्तान की इस मशहूर शायरा के बारे में कहा जाता है, कि जब उन्होंने 1982 में सेंट्रल सुपीरयर सर्विस की लिखित परीक्षा दी तो उस परीक्षा में उन्हीं पर एक सवाल पूछा गया था जिसे देखकर वह आत्मविभोर हूँ गयी थी।

परवीन शाकिर की कवितायें 

मशवरा – परवीन शाकिर

नन्ही लड़की साहिल के इतने नज़दीक रेत से अपने घर न बना कोई सरकश मौज इधर आई तो तेरे घर की बुनियादें तक बह जाएँगी और फिर उनकी याद में तू सारी उम्र उदास...

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बस इतना याद है – परवीन शाकिर

दुआ तो जाने कौन-सी थी ज़ह्‍न में नहीं बस इतना याद है कि दो हथेलियाँ मिली हुई थीं जिनमें एक मेरी थी और इक तुम्हारी

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ध्यान – परवीन शाकिर

हरे लान में सुर्ख़ फूलों की छाँव में बैठी हुई मैं तुझे सोचती हूँ मिरी उँगलियाँ सब्ज़ पत्तों को छूती हुई तेरे हमराह गुज़रे हुए मौसमों की महक चुन रही हैं वो दिलकश महक...

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कंगन बेले का – परवीन शाकिर

उसने मेरे हाथ में बाँधा उजला कंगन बेले का पहले प्यार से थमी कलाई बाद उसके हौले-हौले पहनाया गहना फूलों का फिर झुककर हाथ को चूम लिया फूल तो आखिर फूल ही थे मुरझा...

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काँच की सुर्ख़ चूड़ी – परवीन शाकिर

काँच की सुर्ख़ चूड़ी मेरे हाथ में आज ऐसे खनकने लगी है जैसे कल रात शबनम में लिक्खी हुई तेरे हाथ की शोख़ियों को हवाओं ने सुर दे दिया हो

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प्यार – परवीन शाकिर

अब्र-ए-बहार ने फूल का चेहरा अपने बनफ़्शी हाथ में लेकर ऐसे चूमा फूल के सारे दुख ख़ुशबू बन कर बह निकले हैं

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