निदा फ़ाज़ली

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली या मात्र निदा फ़ाज़ली (1938–2014) हिन्दी और उर्दू के मशहूर शायर थे।


Nida-Fazli kavishala

दिल्ली में पिता मुर्तुज़ा हसन और माँ जमील फ़ातिमा के घर तीसरी संतान नें जन्म लिया जिसका नाम बड़े भाई के नाम के क़ाफ़िये से मिला कर मुक़्तदा हसन रखा गया। दिल्ली कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड में इनके जन्म की तारीख १२ अक्टूबर १९३८ लिखवा दी गई। पिता स्वयं भी शायर थे। इन्होने अपना बाल्यकाल ग्वालियर में गुजारा जहाँ पर उनकी शिक्षा हुई। उन्होंने १९५८ में ग्वालियर कॉलेज (विक्टोरिया कॉलेज या लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातकोत्तर पढ़ाई पूरी करी।

वो छोटी उम्र से ही लिखने लगे थे। निदा फ़ाज़ली इनका लेखन का नाम है। निदा का अर्थ है स्वर/ आवाज़/ Voice। फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा।

जब वह पढ़ते थे तो उनके सामने की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी जिससे वो एक अनजाना, अनबोला सा रिश्ता अनुभव करने लगे थे। लेकिन एक दिन कॉलेज के बोर्ड पर एक नोटिस दिखा “Miss Tondon met with an accident and has expired” (कुमारी टंडन का एक्सीडेण्ट हुआ और उनका देहान्त हो गया है)। निदा बहुत दु:खी हुए और उन्होंने पाया कि उनका अभी तक का लिखा कुछ भी उनके इस दुख को व्यक्त नहीं कर पा रहा है, ना ही उनको लिखने का जो तरीका आता था उसमें वो कुछ ऐसा लिख पा रहे थे जिससे उनके अंदर का दुख की गिरहें खुलें। एक दिन सुबह वह एक मंदिर के पास से गुजरे जहाँ पर उन्होंने किसी को सूरदास का भजन मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे? गाते सुना, जिसमें कृष्ण के मथुरा से द्वारका चले जाने पर उनके वियोग में डूबी राधा और गोपियाँ फुलवारी से पूछ रही होती हैं ऐ फुलवारी, तुम हरी क्यों बनी हुई हो? कृष्ण के वियोग में तुम खड़े-खड़े क्यों नहीं जल गईं? वह सुन कर निदा को लगा कि उनके अंदर दबे हुए दुख की गिरहें खुल रही है। फिर उन्होंने कबीरदास, तुलसीदास, बाबा फ़रीद इत्यादि कई अन्य कवियों को भी पढ़ा और उन्होंने पाया कि इन कवियों की सीधी-सादी, बिना लाग लपेट की, दो-टूक भाषा में लिखी रचनाएँ अधिक प्रभावकारी है जैसे सूरदास की ही उधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अराधै ते ईस॥, न कि मिर्ज़ा ग़ालिब की एब्सट्रैक्ट भाषा में “दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?”। तब से वैसी ही सरल भाषा सदैव के लिए उनकी अपनी शैली बन गई।

निदा फ़ाज़ली की कवितायें 

यह बात तो गलत है – निदा फ़ाज़ली

कोई किसी से खुश हो और वो भी बारहा हो यह बात तो ग़लत है रिश्ता लिबास बन कर मैला नहीं हुआ हो यह बात तो ग़लत है वो चाँद रहगुज़र का, साथी जो...

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सोचने बैठे जब भी उसको – निदा फ़ाज़ली

सोचने बैठे जब भी उसको अपनी ही तस्वीर बना दी ढूँढ़ के तुझ में, तुझको हमने दुनिया तेरी शान बढ़ा दी

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म्यूज़ियम – निदा फ़ाज़ली

सलाखें ही सलाखें अनगिनत छोटे-बड़े ख़ाने हर इक ख़ाना नया चेहरा हर इक चेहरा नई बोली कबूतर लोमड़ी तितली हिरण, पत्थर, किरण, नागिन क्भी कुछ रंग सा झमके कभी शोले-सा बल खाये कभी जंगल,...

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सिखा देती है चलना – निदा फ़ाज़ली

सिखा देती है चलना ठोकरें भी राहगीरों को कोई रास्ता सदा दुशवार हो ऐसा नहीं होता कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो हरेक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं...

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जब भी दिल ने दिल को सदा दी – निदा फ़ाज़ली

जब भी दिल ने दिल को सदा दी सन्नाटों में आग लगा दी… मिट्टी तेरी, पानी तेरा जैसी चाही शक्ल बना दी छोटा लगता था अफ्साना मैंने तेरी बात बढ़ा दी

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