जानकीवल्लभ शास्त्री

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

जानकीवल्लभ शास्त्री (१९१६ – २०११) हिंदी व संस्कृत के कवि, लेखक एवं आलोचक थे।


Janki-Ballabh-Shastri

वे छायावादोत्तर काल के सुविख्यात कवि थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था। आचार्य का काव्य-संसार बहुत ही विविध और व्यापक है।वे थोड़े-से कवियों में रहे हैं, जिन्हें हिंदी कविता के पाठकों से बहुत मान-सम्मान मिला है। प्रारंभ में उन्होंने संस्कृत में कविताएँ लिखीं। फिर महाकवि निराला की प्रेरणा से हिंदी में आए।

शास्त्रीजी का जन्म बिहार के गया जिले के मैगरा गाँव में हुआ था।

कविता के क्षेत्र में उन्होंने कुछ सीमित प्रयोग भी किए और सन चालीस के दशक में कई छंदबद्ध काव्य-कथाएँ लिखीं, जो ‘गाथा` नामक उनके संग्रह में संकलित हैं। इसके अलावा उन्होंने कई काव्य-नाटकों की रचना की और ‘राधा` जैसा श्रेष्ठ महाकाव्य रचा। परंतु शास्त्री की सृजनात्मक प्रतिभा अपने सर्वोत्तम रूप में उनके गीतों और ग़ज़लों में प्रकट होती है।

इस क्षेत्र में उन्होंने नए-नए प्रयोग किए जिससे हिंदी गीत का दायरा काफी व्यापक हुआ। वैसे, वे न तो नवगीत जैसे किसी आंदोलन से जुड़े, न ही प्रयोग के नाम पर ताल, तुक आदि से खिलवाड़ किया। छंदों पर उनकी पकड़ इतनी जबरदस्त है और तुक इतने सहज ढंग से उनकी कविता में आती हैं कि इस दृष्टि से पूरी सदी में केवल वे ही निराला की ऊंचाई को छू पाते हैं।

२६ जनवरी २०१० को भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया किन्तु इसे ‘मजाक’ कहकर शास्त्रीजी ने अस्वीकार कर दिया। सात अप्रैल २०११ को मुजफ्फरपुर के निराला निकेतन में जानकीवल्लभ शास्त्री ने अंतिम सांस ली।

छायावाद के अंतिम स्तम्भ माने जाने वाले आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का गुरुवार रात मुजफ्फरपुर में निधन हो गया। वह 98 वर्ष के थे। उनके निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं कई साहित्यकारों ने शोक जताया है।

जानकीवल्लभ शास्त्री की कवितायें 

यह पीर पुरानी हो – जानकीवल्लभ शास्त्री

यह पीर पुरानी हो ! मत रहो हाय, मैं, जग में मेरी एक कहानी हो। मैं चलता चलूँ निरन्तर अन्तर में विश्वास भरे, इन सूखी-सूखी आँखों में, तेरी ही प्यास भरे, मत पहुँचु तुझ...

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किसने बाँसुरी बजाई – जानकीवल्लभ शास्त्री

जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई ! किसने बाँसुरी बजाई अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई ! किसने बाँसुरी बजाई जटिल कर्म-पथ पर थर-थर...

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माझी उसको मझधार न कह – जानकीवल्लभ शास्त्री

रुक गयी नाव जिस ठौर स्वयं, माझी, उसको मझधार न कह ! कायर जो बैठे आह भरे तूफानों की परवाह करे हाँ, तट तक जो पहुँचा न सका, चाहे तू उसको ज्वार न कह...

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मौज – जानकीवल्लभ शास्त्री

सब अपनी-अपनी कहते हैं! कोई न किसी की सुनता है, नाहक कोई सिर धुनता है, दिल बहलाने को चल फिर कर, फिर सब अपने में रहते हैं! सबके सिर पर है भार प्रचुर सब...

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रक्तमुख – जानकीवल्लभ शास्त्री

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है, लाज लजाती जिसकी कृति से धृति उपदेश वह है, मूर्त दंभ गढ़ने उठता है शील विनय परिभाषा, मृत्यु रक्तमुख से देता जन को जीवन की...

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उदयति मिहिरो, विगलति तिमिरो – जानकीवल्लभ शास्त्री

उदयति मिहिरो,विगलति तिमिरो भुवनं कथमभिरामम् प्रचरति चतुरो मधुकरनिकरो गुंजति कथमविरामम्॥ विकसति कमलं,विलसति सलिलम् पवनो वहति सलीलम् दिशिदिशि धावति,कूजति नृत्यति खगकुलमतिशयलोलम्॥ शिरसि तरूणां रविकिरणानाम् खेलति रुचिररुणाभा उपरि दलानाम् हिमकणिकानाम् कापि हृदयहरशोभा॥

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