कुँवर नारायण

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

कुँवर नारायण (1927–2017) हिन्दी कवि थे।


Kunwar-Narayan-kavishala

कुँवर नारायण का जन्म १९ सितंबर १९२७ को हुआ। नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (१९५९) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। कुँवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। कुंवर नारायण का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता रही है पर इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। ‘तनाव‘ पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है। 2009 में कुँवर नारायण को वर्ष 2005 के लिए देश के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उन्होने इंटर तक की पढ़ाई विज्ञान विषय से की लेकिन आगे चल कर वे साहित्य के विद्यार्थी बने और १९५१ में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। वे उत्तर प्रदेश के संगीत नाटक अकादमी के १९७६ से १९७९ तक उप पीठाध्यक्ष रहे और १९७५ से १९७८ तक अज्ञेय द्वारा संपादित मासिक पत्रिका नया प्रतीक के संपादक मंडल के सदस्य भी रहे। पहले माँ और फिर बहन की असामयिक मौत ने उनकी अन्तरात्मा को झकझोर कर रख दिया, पर टूट कर भी जुड़ जाना उन्होंने सीख लिया था। पैतृक रूप में उनका कार का व्यवसाय था, पर इसके साथ उन्होंने साहित्य की दुनिया में भी प्रवेश करना मुनासिब समझा। इसके पीछे वे कारण गिनाते हैं कि साहित्य का धंधा न करना पड़े इसलिए समानान्तर रूप से अपना पैतृक धंधा भी चलाना उचित समझा।

कुँवर नारायण की कवितायें 

सृजन के क्षण – कुंवर नारायण

रात मीठी चांदनी है, मौन की चादर तनी है, एक चेहरा ? या कटोरा सोम मेरे हाथ में दो नयन ? या नखतवाले व्‍योम मेरे हाथ में? प्रकृति कोई कामिनी है? या चमकती नागिनी है? रूप-...

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नीली सतह पर – कुंवर नारायण

सुख की अनंग पुनरावृत्तियों में, जीवन की मोहक परिस्थितियों में, कहाँ वे सन्तोष जिन्हें आत्मा द्वारा चाहा जाता है ? शीघ्र थक जाती देह की तृप्ति में, शीघ्र जग पड़ती व्यथा की सुप्ति में, कहाँ...

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लिपटी परछाइयाँ – कुंवर नारायण

उन परछाइयों को, जो अभी अभी चाँद की रसवंत गागर से गिर चाँदनी में सनी खिड़की पर लुढ़की पड़ी थीं, किसने बटोरा? चमकीले फूलों से भरा तारों का लबालब कटोरा किसने शिशु-पलकों पर उलट...

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माध्यम – कुंवर नारायण

वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है, मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है : एक दृष्टि है जो संसार से अलग...

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ओस-नहाई रात – कुंवर नारायण

ओस-नहाई रात गीली सकुचती आशंक, अपने अंग पर शशि-ज्योति की संदिग्ध चादर डाल, देखो आ रही है व्योमगंगा से निकल इस ओर झुरमुट में सँवरने को …. दबे पाँवों कि उसको यों अव्यवस्थित ही...

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