अशोक चक्रधर

जीवन परिचय – (विकिपीडिया से)

डॉ॰ अशोक चक्रधर’ (जन्म ८ फ़रवरी सन् १९५१) हिंदी के विद्वान, कवि एवं लेखक है।[1] हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट प्रतिभा के कारण प्रसिद्ध वे कविता की वाचिक परंपरा का विकास करने वाले प्रमुख विद्वानों में से भी एक है
Ashok_Chakradhar kavishala

अशोक चक्रधर जी अशोक चक्रधर जी का जन्म ८ फ़रवरी, सन १९५१ में खु्र्जा (उत्तर प्रदेश) के अहीरपाड़ा मौहल्ले में हुआ। उनके पिताजी डॉ॰ राधेश्याम ‘प्रगल्भ’ अध्यापक, कवि, बाल साहित्यकार और संपादक थे।[5] उन्होंने ‘बालमेला’ पत्रिका का संपादन भी किया। उनकी माता कुसुम प्रगल्भ गृहणी थीं। बचपन से ही विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने में उनकी रुचि थी। बचपन से ही उन्हें अपने कवि पिता का साहित्यिक मार्गदर्शन मिला और उनके कवि-मित्रों की गोष्ठियों के माध्यम से उन्हें कविता लेखन की अनौपचारिक शिक्षा मिली। सन १९६० में उन्होंने रक्षामंत्री ‘कृष्णा मेनन’ को अपनी पहली कविता सुनाई।

सन १९६२ में सोहन लाल द्विवेदी की अध्यक्षता में अपने पिता द्वारा आयोजित एक कवि सम्मेलन अशोक चक्रधर ने अपने मंचीय जीवन की पहली कविता पढ़कर पं.सोहनलाल द्विवेदी जी का आशीर्वाद प्राप्त किया। साहित्यिक अभिरुचि के साथ-साथ अपनी पढ़ाई के प्रति भी अशोक चक्रधर काफ़ी सतर्क रहे। सन् १९७० में उन्होंने बी. ए. प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण किया। 1968 में वे मथुरा में आकाशवाणी केन्द्र में ऑडिशंड आर्टिस्ट के रूप में चुने गए। 1972 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में एम. लिट्. में प्रवेश लिया। इसी बीच 1972 में उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में प्रध्यापक पद पर नियुक्त मिल गई। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में इन दिनों अनेक गुणात्मक परिवर्तन हुए। उनकी पहली पुस्तक मैकमिलन से ‘मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया’ 1975 में प्रकाशित हुई। जोधपुर विश्वविद्यालय ने इस पुस्तक को युवा लेखन द्वारा लिखी गई वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक का पुरस्कार दिया। 1975 में उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्राध्यापक के पद पर कार्य प्रारंभ किया, जहाँ वे २००८ तक कार्यरत रहे। उन्होंने प्रौढ़ एवं नवसाक्षरों के लिए विपुल लेखन, नाटक, अनुवाद, कई चर्चित धारावाहिकों, वृत्त चित्रों का लेखन निर्देशन करने के अलावा कंप्यूटर में हिंदी के प्रयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण काम किया है।

वे जननाट्य मंच के संस्थापक सदस्य भी हैं। इनका नाटक बंदरिया चली ससुराल नाटक का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा द्वारा मंचन हो चुका है। इसके निर्देशक श्री राकेश शर्मा तथा रंगमंडल, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय है। और श्री रंजीत कपूर के नाटक ‘आदर्श हिन्दू होटल’ एवं ‘शॉर्टकट’ के लिए गीत लेखन भी इन्होंने किया। अशोक चक्रधर ने हिन्दी के विकास में कम्प्यूटर की भूमिका विषयक शताधिक पावर-पाइंट प्रस्तुतियां की हैं और ये हिन्दी सलाहकार समिति, ऊर्जा मंत्रालय, भारत सरकार तथा हिमाचल कला संस्कृति और भाषा अकादमी, हिमाचल प्रदेश सरकार, शिमला के भूतपूर्व सदस्य रह चुके है। वे साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक उद्देश्यों के लिए विश्व भ्रमण करते रहे हैं।

अशोक चक्रधर की कवितायें 

फिर तो – अशोक चक्रधर

आख़िर कब तक इश्क इकतरफ़ा करते रहोगे, उसने तुम्हारे दिल को चोट पहुँचाई तो क्या करोगे? -ऐसा हुआ तो लात मारूँगा उसके दिल को। -फिर तो पैर में भी चोट आएगी तुमको।

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परदे हटा के देखो -अशोक चक्रधर

ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो, ग़म हैं हंसी के अंदर, परदे हटा के देखो। लहरों के झाग ही तो, परदे बने हुए हैं, गहरा बहुत समंदर, परदे हटा के...

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सिक्के की औक़ात – अशोक चक्रधर

एक बार बरखुरदार! एक रुपए के सिक्के, और पाँच पैसे के सिक्के में, लड़ाई हो गई, पर्स के अंदर हाथापाई हो गई। जब पाँच का सिक्का दनदना गया तो रुपया झनझना गया पिद्दी न...

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तेरा है – अशोक चक्रधर

तू गर दरिन्दा है तो ये मसान तेरा है, अगर परिन्दा है तो आसमान तेरा है। तबाहियां तो किसी और की तलाश में थीं कहां पता था उन्हें ये मकान तेरा है। छलकने मत...

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ससुर जी उवाच – अशोक चक्रधर

डरते झिझकते सहमते सकुचाते हम अपने होने वाले ससुर जी के पास आए, बहुत कुछ कहना चाहते थे पर कुछ बोल ही नहीं पाए। वे धीरज बँधाते हुए बोले- बोलो! अरे, मुँह तो खोलो।...

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माशो की माँ – अशोक चक्रधर

नुक्कड़ पर माशो की माँ बेचती है टमाटर। चेहरे पर जितनी झुर्रियाँ हैं झल्ली में उतने ही टमाटर हैं। टमाटर नहीं हैं वो सेव हैं, सेव भी नहीं हीरे-मोती हैं। फटी मैली धोती से...

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आलपिन कांड – अशोक चक्रधर

बंधुओ, उस बढ़ई ने चक्कू तो ख़ैर नहीं लगाया पर आलपिनें लगाने से बाज़ नहीं आया। ऊपर चिकनी-चिकनी रैक्सीन अंदर ढेर सारे आलपीन। तैयार कुर्सी नेताजी से पहले दफ़्तर में आ गई, नेताजी आए...

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मेमने ने देखे जब गैया के आंसू – अशोक चक्रधर

माता पिता से मिला जब उसको प्रेम ना, तो बाड़े से भाग लिया नन्हा सा मेमना। बिना रुके बढ़ता गया, बढ़ता गया भू पर, पहाड़ पर चढ़ता गया, चढ़ता गया ऊपर। बहुत दूर जाके...

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किधर गई बातें -अशोक चक्रधर

चलती रहीं चलती रहीं चलती रहीं बातें यहाँ की, वहाँ की इधर की, उधर की इसकी, उसकी जने किस-किस की, कि एकएक सिर्फ़ उसकी आँखों को देखा मैंने उसने देखा मेरा देखना । और…...

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ख़लीफ़ा की खोपड़ी – अशोक चक्रधर

दर्शकों का नया जत्था आया गाइड ने उत्साह से बताया— ये नायाब चीज़ों का अजायबघर है, कहीं परिन्दे की चोंच है कहीं पर है। ये देखिए ये संगमरमर की शिला एक बहुत पुरानी क़बर...

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पहला क़दम – अशोक चक्रधर

अब जब विश्वभर में सबके सब, सभ्य हैं, प्रबुद्ध हैं तो क्यों करते युद्ध हैं ? कैसी विडंबना कि आधुनिक कहाते हैं, फिर भी देश लड़ते हैं लहू बहाते हैं। एक सैनिक दूसरे को बिना...

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नेता जी लगे मुस्कुराने – अशोक चक्रधर

एक महा विद्यालय में नए विभाग के लिए नया भवन बनवाया गया, उसके उद्घाटनार्थ विद्यालय के एक पुराने छात्र लेकिन नए नेता को बुलवाया गया। अध्यापकों ने कार के दरवाज़े खोले नेती जी उतरते...

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कितनी रोटी – अशोक चक्रधर

गांव में अकाल था, बुरा हाल था। एक बुढ़ऊ ने समय बिताने को, यों ही पूछा मन बहलाने को— ख़ाली पेट पर कितनी रोटी खा सकते हो गंगानाथ ? गंगानाथ बोला— सात ! बुढ़ऊ बोला— गलत !...

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नन्ही सचाई -अशोक चक्रधर

एक डॉक्टर मित्र हमारे स्वर्ग सिधारे। असमय मर गए, सांत्वना देने हम उनके घर गए। उनकी नन्ही-सी बिटिया भोली-नादान थी, जीवन-मृत्यु से अनजान थी। हमेशा की तरह द्वार पर आई, देखकर मुस्कुराई। उसकी नन्ही-सचाई...

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दया – अशोक चक्रधर

भूख में होती है कितनी लाचारी, ये दिखाने के लिए एक भिखारी, लॉन की घास खाने लगा, घर की मालकिन में दया जगाने लगा। दया सचमुच जागी मालकिन आई भागी-भागी- क्या करते हो भैया ?...

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