अपना दिल अपने हालात – राजिंदर सिंह ‘दिलदार’ ( दिलदार देहलवी )

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नाम: दिलदार देहलवी

जन्म स्थान: लुधिआना

सुनिए दिलदार देहलवी की कहानी उनकी जुबानी –

अपना दिल अपने हालात मेरा जन्म लुधिआना में, मंडी अहमदगढ़ नाम के एक छोटे से कसबे में हुआ ! मेरी माँ श्रीमती कुलवंत कौर ने हम तीन भाइयों और चार बहनो की बहुत मुहब्बत और सख्त अनुशासन में परवरिश की I मेरे पिता श्री अवतार सिंह एक छोटे मोटे व्यवसाई थे और बड़ी मेहनत मशक़्क़त के साथ उन्होंने पूरे परिवार का बोझ अपने कंधो पर उठाये रक्खा I उनकी यह मेहनत मशक़्क़त हम भाई बहनो की भी विरासत में मिली है. १९६६ में पिता जी हम सब को लेकर दिल्ली आ गए और आज उनका साथ न होने के बावजूद हम तीनो भाई दिल्ली में ही हैं. बच्चपन से ही शायरी और संगीत का शौक मेरे ऊपर जुनून की तरह हावी रहा लेकिन घर के हालात, गरीबी ने इस शौक को परवान चढ़ने का मौका नहीं दिया I शायद १९८०-८१ का दौर था, किसी घर से बड़ी सुरीली आवाज़ में ग़ज़लों की सदा सुनाई दी I मैं खुद को रोक नहीं सका. द

रवाज़े पर दस्तक दे दी. एक बुज़ुर्ग बाहर आये, मैंने पूछा, ये कौन ग़ज़ल सिंगर है . उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया, ये जगजीत सिंह है, तुम नहीं जानते क्या. मैं बिना जवाब दिए वापिस हुआ और सीधे एक कैसेट्स की दुकान पर पहुँच गया और फिर जगजीत सिंह मेरे हाथों में थे. जगजीत की गायकी मेरे लिए नशा बन गयी और उनका कोई भी नया एल्बम मेरी पहुँच से बाहर नहीं होता था. जगजीत सिंह के बहुत से स्टेज प्रोग्रामों में मैंने शिरकत भी की. जगजीत जी से मेरी कई मुलाकातें हुईं.

 

वो और उनसे मुलाकातें शायद मैं अपनी आखरी सांसों तक भूल नहीं पाऊंगा. इन ग़ज़लों ने मेरे अंदर भी शायरी के कीड़े पैदा कर दिए और मैं अशआर, ग़ज़लें कहने लगा .चंद दोस्तों को छोड़ कर मेरे शायर होने की खबर किसी को भी नहीं थी और कहीं खुद को शायर बताते हुए मुझे भी जाने क्यों झेंप महसुस होती थी. लोग कहते है, इश्क़ मुशक और शायरी छुपाये नहीं छुपते. मेरा शायर होना भी बेनक़ाब हो गया. दोस्तों ने जबरन एक छोटे से मुशायरे में आर्गनाइज़र तक मेरे नाम की स्लिप पहुंचा दी. उस आयोजन में पड़ना मेरे लिए एक नया सबक था. घबराहट, झि

 

झक बदहवासी सभी मुझ पर हावी थे और मैंने फैसला कर लिया था कि अब किसी प्रोग्राम में मंच पर नहीं चढूंगा. लेकिन कुछ ही दिनों बाद शहर की एक संस्था ने निमंत्रण भेजा तो दि

ल नहीं माना और दोबारा की गयी ये गलती बार बार की जाने वाली गलती बन गयी. मैं शायरी करने लगा था लेकिन शायरी की तकनीक, उस के कानून और नियम कायदों से अनजान था दो एक आयोजनों में मुझे कुछ बाद रचना कारो ने टोका भी कि तुम्हारी रचनाओं में कमियां है मैंने उनसे कमियां दूर करने के लिए प्रार्थना की, कुछ लोग समय न होने की बात कह कर कन्नी काट गए. कुछ लोगो ने इस शर्त पर कमियां दूर करने का भरोसा दिलाया कि मैं उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लूँ . शिष्य बनाने की जो जटिल शर्तें उन्होंने बतायीं, उन पर चलना मेरे बूते की बात नहीं थी, मैं यूँ ही लिखता पढ़ता रहा . फिर मेरी मुलाकात अजमेर के अमित टंडन, बहराइच के ए.के .भट्ट और गोंडा के हर्षवर्धन से हुई. इन दोस्तों ने अपनी तरफ से मुझे ग़ज़लों की तकनीक सिखाने की कोशिश की जिसका मैंने भी पालन किया. लेकिन ये तीनों मित्र भी शायरी के कायदे कानून से एक सीमा तक ही परिचित थे लिहाज़ा मेरी शायरी की गाड़ी एक प्लेटफॉर्म पर रुकी ही रही. दिल्ली में भी मैंने कुछ लोगों से मदद चाही लेकिन उर्दू का ज्ञान न होना मेरे लिए मुसीबत ही बना रहा. इसी दौरान दिल्ली के एक प्रोग्राम में मेरी मुलाकात सर्वत जमाल से हुई और प्रोग्राम के खात्मे पर उन्होंने बड़ी बेतकल्लुफी से मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, सरदार जी कमियां कब दूर करोगे अपनी शायरी की. पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, जब आप दूर करने में मदद करोगे. हम दोनों हंस पड़े और अगले दिन मैंने उन्हें फ़ोन किया, मिलने की इच्छा ज़ाहिर की और डेढ़ घंटे बाद हम दोनों एक दुसरे के आमने सामने थे. कमियां दूर करने और शायरी के बारीक नुक्ते सीखते सिखाते कब हम दोस्ती और भाईचारगी के रिश्ते में दाखिल हो गए, पता ही नहीं चला. सर्वत जमाल ने मुझे शायरी का सीधा रास्ता दिखा दिया और ये उनकी हौसला अफ़ज़ाई का अंजाम है कि मेरे अंदर खुद ब खुद एस आत्म विश्वास पैदा हुआ कि कुछ ही महीनों में मुझे अपनी पहली किताब लांच करने के ख्वाब दिखाई देने लगे. इस ख़्वाब को हक़ीक़त का रूप देने में जितनी मेहनत मैंने की है उस से कम मेहनत मेरे भाई, दोस्त सर्वत जमाल ने नहीं की. मैं अपनी धर्म पातीं श्रीमती भूपिंदर कौर, दोनों बच्चों रवनीत सिंह और प्रभजोत कौर तथा पुत्र जैसे ही दामाद इंद्र पाल सिंह का भी इस लिए आभारी हूँ कि इस पुःतक की तैयारी के दौरान मैं उन्हें वो समय और अपेक्षित तवज्जह नहीं दे सका जो उनका का हक़ है. मेरी पहली कोशिश, किताब की शक्ल में आपके सामने है. ग़ज़लें, हर शायर की तरह मुझे भी लगता है कि आपको पसंद आयेंगी क्यों की हलकी ग़ज़लें तो सर्वत जमाल ने पहले ही बड़ी बेदर्दी से काट छांट कर किनारे फ़ेंक दीं. किताब और इसमें प्रकाशित ग़ज़लें आपको कैसी लगीं, बताइयेगा ज़रूर. मुझे आपकी प्रतिकिर्या का इंतज़ार रहेगा.

 

 

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